बाबा गंभीरनाथ का जीवन आत्मानुशासन, साधना और लोककल्याण की प्रेरणा : प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा
गोरखपुर, 08 अक्टूबर (हि.स.)। महाराणा प्रताप महाविद्यालय, जंगल धूसड़, गोरखपुर में योगीराज बाबा गंभीरनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि के पावन अवसर पर श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया गया। समारोह के मुख्य वक्ता अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने बाबा गंभीरनाथ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे केवल संत और सिद्ध योगी ही नहीं, बल्कि भारतीय योग, तपस्या, वैराग्य और आध्यात्मिक साधना की महान परंपरा के प्रतीक थे।
विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए प्रो. विश्वकर्मा ने कहा कि बाबा गंभीरनाथ का जीवन यह संदेश देता है कि योग केवल शरीर को साधने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि स्वयं को साधने, अंतर्निहित शक्तियों को पहचानने और उन्हें लोककल्याण के लिए समर्पित करने का मार्ग है। उनका जीवन आत्मज्ञान, आत्मानुशासन, संयम और सेवा के समन्वय की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि बाबा गंभीरनाथ ने सांसारिक सुख-सुविधाओं के बजाय आध्यात्मिक सत्य की खोज को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। उन्होंने भारत के विभिन्न साधना स्थलों की यात्रा करते हुए कठिन तपस्या की। प्रयागराज के झूंसी में गुफा साधना, अमरकंटक में तपस्या, गया के कपिलधारा क्षेत्र में साधना तथा कैलाश-मानसरोवर की आध्यात्मिक यात्रा उनके साधनामय जीवन की महत्वपूर्ण कड़ियां रही हैं।
प्रो. विश्वकर्मा ने कहा कि बाबा गंभीरनाथ को नाथ योग परंपरा में हठयोग, राजयोग और लययोग के महान साधक के रूप में स्मरण किया जाता है। उनके लिए योग आसन और प्राणायाम तक सीमित नहीं था, बल्कि मन, इंद्रियों, विचारों और अहंकार पर विजय प्राप्त करना ही वास्तविक योग था। उनका जीवन ज्ञान और कर्म, साधना और सेवा तथा आत्मविकास और लोककल्याण के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देता है।
युवाओं का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में विद्यार्थी प्रतिस्पर्धा, तनाव, सोशल मीडिया के दबाव और त्वरित सफलता की चाह जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे समय में बाबा गंभीरनाथ का जीवन युवाओं को सिखाता है कि वास्तविक सफलता बाहरी उपलब्धियों से अधिक अपने मन पर विजय, चरित्र निर्माण और जीवन को किसी बड़े उद्देश्य से जोड़ने में है। उन्होंने विद्यार्थियों से आत्मानुशासन, धैर्य, संयम और सकारात्मक चिंतन को जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि बाबा गंभीरनाथ जी ने 21 मार्च 1917 को देह का त्याग किया, किंतु महान संतों का व्यक्तित्व उनके शरीर के साथ समाप्त नहीं होता। गोरखनाथ मंदिर परिसर स्थित उनकी समाधि आज भी उनकी तपस्या और आध्यात्मिक विरासत की स्मृति को जीवंत बनाए हुए है। बाबा गंभीरनाथ का जीवन यह विश्वास प्रदान करता है कि मनुष्य अपनी अंतर्निहित शक्ति को पहचानकर, विचारों को शुद्ध कर तथा जीवन को अनुशासन और सेवा से जोड़कर स्वयं के साथ समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
श्रद्धांजलि समारोह की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. मनीष कुमार त्रिपाठी ने की। कार्यक्रम का संचालन रक्षा एवं स्ट्रेतजिक अध्ययन विभाग के सहायक आचार्य विवेक विश्वकर्मा ने किया। समारोह में महाविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय