पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित, किसान अपनाएं प्रबंधन की तकनीकें : डॉ. श्याम सिंह
कानपुर, 18 सितंबर (हि.स.)। खेत में पराली जलाने से मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवों और केंचुओं को नुकसान पहुंचता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है। किसान फसल अवशेषों से कंपोस्ट बनाने के साथ बायोगैस, मशरूम उत्पादन और पैकिंग सामग्री तैयार करने जैसे विकल्प अपना सकते हैं। यह बातें शुक्रवार को कृषि विज्ञान केंद्र बांदा के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. श्याम सिंह ने कृषि विज्ञान केंद्र दिलीप नगर में आयोजित पांच दिवसीय कृषक प्रशिक्षण के समापन समारोह में कही।
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अधीन संचालित कृषि विज्ञान केंद्र दिलीप नगर में ‘मशीनों द्वारा फसल अवशेषों का प्रबंधन’ विषय पर प्रशिक्षण दिया गया। इसमें कानपुर देहात के 25 किसानों ने हिस्सा लिया। प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों को फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन की तकनीकों की जानकारी देना था।
केंद्र के प्रभारी डॉ. अजय कुमार सिंह ने बताया कि धान की लंबी अवधि वाली किस्मों की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच करीब 15 दिन का समय रहता है, जिससे धान की पराली का प्रबंधन चुनौती बन जाता है। उन्होंने कहा कि पीबी 1509 और पीबी 1692 जैसी कम अवधि वाली धान की किस्मों की बुवाई से पराली प्रबंधन के लिए करीब एक माह का समय मिल सकता है। उन्होंने किसानों से पराली न जलाने और जल संरक्षण के लिए स्वयं जागरूक होने के साथ अन्य किसानों को भी प्रेरित करने की अपील की।
केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. खलील खान ने पराली के उचित प्रबंधन से मिट्टी के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव की जानकारी दी। उन्होंने जीरो ट्रिल ड्रिल, हैप्पी सीडर, सुपर सीडर और स्मार्ट सीडर जैसी मशीनों के उपयोग से गेहूं की बुवाई तथा मिट्टी के भौतिक गुणों में सुधार के बारे में बताया।
वैज्ञानिक डॉ. दीपक मिश्रा ने मशीनों से पराली प्रबंधन के आर्थिक लाभ और पराली आधारित विभिन्न व्यवसायों की जानकारी दी। साथ ही संबंधित योजनाओं में मिलने वाली सब्सिडी के बारे में भी बताया। कार्यक्रम में डॉ. राजेश राय, डॉ. अरुण कुमार सिंह, उपेंद्र कुमार सिंह, दिव्यांशु यादव, शुभम यादव और प्रगतिशील किसान चरन सिंह, अशोक व जय सिंह समेत अन्य लोग मौजूद रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप