नींद की गुणवत्ता प्रभावित होने से डिप्रेशन : सतीश राय

 


-जीवन भर दवा खाने वालों का बढ़ता जाता है डोज-दवाओं के लगातार सेवन से शरीर की प्रतिरक्षा तंत्र हाेती है निर्भर

प्रयागराज, 11 जनवरी (हि.स.)। मौसम बदलने पर बार-बार संक्रमित होना और बीमार पड़ना शरीर की प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होने के लक्षण हैं। यदि उम्र 50 वर्ष से ज्यादा है तो इस उम्र में नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं।

यह बातें रविवार को एसकेआर योग एवं रेकी शोध प्रशिक्षण और प्राकृतिक संस्थान प्रयागराज रेकी सेंटर पर जाने-माने एवं प्रसिद्ध स्पर्श चिकित्सक सतीश राय ने लोगों को सम्बोधित करते हुए कही।

-दवाओं के लगातार सेवन से शरीर की प्रतिरक्षातंत्र हो जाती है निर्भरसतीश राय ने कहा कि मौसम बदलते ही हर बार बीमार पड़ते हैं तो गंभीर और अदृश्य बीमारी के होने की सूचना शरीर आपको दे रहा है, इसे अनदेखा न करें। हारमोंस के उतार-चढ़ाव के कारण शरीर में अचानक कुछ बदलाव असहज हो सकते हैं, लेकिन कुछ समय में शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र इसे कंट्रोल कर लेगा। आप चाहें तो प्राकृतिक तरीकों का सहारा ले सकते हैं, लेकिन ऐसे समय में अंग्रेजी या एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन कुछ दिनों के लिए कर लिया तो शरीर की रक्षा प्रणाली निष्क्रिय होकर उन दवाओं पर निर्भर हो जाएगी।

-जीवन भर दवा खाने वालों का बढ़ता जाता है डोजसतीश राय कहा कि मेडिसिन या ड्रग किसी भी बीमारी को ठीक नहीं करता, वह सिर्फ कंट्रोल करता है। यदि लगातार मेडिसिन खा रहे हैं तो वह कुछ समय के पश्चात उसका असर शरीर पर खत्म हो जाता है। मेडिसिन का डोज बढ़ाने पर वह पुनः अपना काम करने लगता है। इस तरह जीवन में दवा का डोज बढ़ता जाएगा और अंत में किसी भी दवा का असर शरीर पर नहीं होगा। WHO का दावा है कि प्रतिवर्ष विश्व में करीब एक करोड़ लोगों की मौत एंटीबायोटिक दवाओं के असर नहीं करने से होती है।

-स्वस्थ रहने के लिए प्राकृतिक तरीकों को अपनाना बेहतरसतीश राय ने कहा कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने भी मन की बात कार्यक्रम में लगातार दवाओं के सेवन पर चिंता जाहिर कर चुके हैं। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए मौसम के अनुसार प्राकृतिक तरीकों को अपनाना ज्यादा अच्छा होता है। उन्होंने कहा कि सर्दियों के मौसम में प्यास कम लगती है पानी कम पीने से या बार-बार गर्म पानी पीने से बचना चाहिए।

-फैट शरीर के तापमान को करती है कंट्रोलठंड के मौसम में बुजुर्गों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उम्र 50 के ऊपर होने पर ज्यादा ठंड में टहलने से बचना चाहिए। बचपन से लेकर जवानी तक त्वचा और हड्डियों के बीच में फैट (वसा) की एक मोटी परत होती है जो ऊर्जा के स्रोत हैं। ठंड से शरीर की रक्षा करती हैं। ठंड को हड्डियों तक पहुंचने नहीं देती लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, फैट की परत पिघलने लगती है। ज्यादा उम्र के पश्चात चमड़ी और हड्डियों के बीच में फैट (वसा) की परत बहुत पतली हो जाती है, जिससे ठंड सीधे हड्डियों तक पहुंच जाती है, जो घातक है। शरीर में फैट त्वचा की सबसे निचली परत होती है जो शरीर के तापमान को मेंटेन करती है। यह त्वचा को हड्डियों और मांसपेशियों से जोड़ती है। इसलिए कमजोर और ज्यादा उम्र के लोगों का कड़ाके की ठंड में टहलना घातक हो सकता है।

हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र