भूमिहीन महिलाओं के लिए पृथक कल्याणकारी प्रकोष्ठ का हाे गठन : के. श्याम प्रसाद

 


भूमिहीन महिला श्रमिकों के लिए योजनाएं बनाए सरकार: डॉ. चंद्रकांता

लखनऊ, 11 सितंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की करोड़ों भूमिहीन किसान महिलाओं का पसीना खेतों को हरा-भरा रखता है, लेकिन भूमि, मजदूरी और निर्णय-अधिकार में उनकी हिस्सेदारी आज भी नगण्य है। इस संबंध में सामाजिक समरसता मंच अवध प्रान्त द्वारा शुक्रवार को विश्व संवाद केन्द्र जियामऊ लखनऊ में आयोजित प्रेसवार्ता के दोरान एक शोध-प्रतिवेदन जारी किया गया। यह शोध दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र की प्रोफेसर डा. चन्द्रकान्ता के.माथुर ने सामाजिक समरसता गतिविधि,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संयोजक के. श्याम प्रसाद के मार्गदर्शन में किया है।

शोधकर्ता डॉ. चंद्रकांता के. माथुर ने प्रेसवार्ता में कहा, जब तक भूमिहीन किसान महिला को 'अन्नदाता' के रूप में मान्यता, भूमि, मजदूरी और निर्णय में उसका वाजिब हक नहीं मिलता, तब तक ग्रामीण भारत का सशक्तिकरण अधूरा रहेगा। नया भारत वह होगा जिसमें खेत की मेड़ पर खड़ी वह महिला भी, जिसके नाम एक इंच ज़मीन नहीं है, उतने ही आत्मविश्वास से नीति-निर्धारण की मेज़ पर अपनी बात रख सके।

सामाजिक समरसता गतिविधि के राष्ट्रीय संयोजक के. श्याम प्रसाद ने कहा, किसान परिवार की महिला हो या भूमिहीन खेत मजदूर परिवार की महिला—दोनों एक ही खेत, एक ही परिश्रम और एक ही सपने की साझेदार हैं। जब तक ग्रामीण भारत की ये दोनों महिला-शक्तियां एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि सहयात्री मानकर आगे नहीं बढ़ेंगी, तब तक सामाजिक समरसता का सपना अधूरा रहेगा।

श्याम प्रसाद ने सरकार से मांग की है कि अनुसूचित जाति एवं वंचित वर्गों की भूमिहीन महिलाओं के लिए पृथक कल्याणकारी प्रकोष्ठ का गठन हो। मनरेगा के अन्तर्गत भूमिहीन महिला श्रमिकों को प्राथमिकता के आधार पर वर्षभर रोजगार मिले।

डा.चन्द्रकान्ता माथुर ने बताया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बुन्देलखण्ड के भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों में निर्धनता की दर 73.4 से 89.8 फीसदी तक है, जो देश के कई राज्यों से कहीं अधिक है। इसमें बुंदेलखंड क्षेत्र और अनुसूचित जाति समुदाय की महिलाएं सबसे बड़ी शिकार हैं। इसके अलावा, 50 और 40 फीसदी प्रदेश की आधी महिलाएं एनीमिया (रक्तअल्पता) से जूझ रही हैं, जबकि 05 वर्ष से कम आयु के 40 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। केवल 16 प्रतिशत भूमिहीन परिवारों के पास स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध है।

सामाजिक समरसता ही समाधान का मार्ग

के. श्याम प्रसाद ने कहा कि सामाजिक समरसता का अर्थ यही है कि गांव की हर महिला—चाहे वह भूमि की मालकिन हो या भूमिहीन खेत मजदूर एक दूसरे को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि सहयात्री माने। समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने का यही मार्ग है, और यही हमारा संकल्प भी है।

सामाजिक समरसता मंच ने इस प्रतिवेदन को सरकार,शासन प्रशासन तथा समाज के हर वर्ग के समक्ष रखते हुए स्पष्ट किया है कि यह लड़ाई किसी एक विभाग या योजना की मोहताज नहीं— यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। सरकार भूमिहीन महिला श्रमिकों के लिए नीति बनाए प्रशासन उसे जमीन तक पहुंचाए।

हिन्दुस्थान समाचार / बृजनंदन