बोधकथाएँ विश्व की साझा सांस्कृतिक धरोहर: डॉ. अमित कुशवाहा
देवरिया, 02 अक्टूबर (हि.स.)। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के अवसर पर शुक्रवार को प्रेस्टिज संस्थान, देवरिया द्वारा आयोजित समारोह में पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा के हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अमित कुमार सिंह कुशवाहा को प्रतिष्ठित ‘राजवल्लभ साहित्य सम्मान–2026’ से सम्मानित किया गया। सम्मान के अंतर्गत उन्हें 21 हजार रुपये की सम्मान राशि, माँ सरस्वती का स्मृति-चिह्न, शाल, साइटेशन तथा ‘राजवल्लभ साहित्य सम्मान–2026’ का प्रतीक-चिह्न प्रदान किया गया।
कार्यक्रम में प्रो. रवि प्रकाश मौर्य, प्रो. सुमन प्रसाद, प्रो. सत्येंद्र कुमार दुबे, डॉ. यशवंत यादव, श्रीमती शिवा सिंह, प्रेस्टिज इंटर कॉलेज के प्राचार्य एवं कार्यक्रम के संरक्षक-मार्गदर्शक डॉ. शिवनारायण सिंह सहित देवरिया शहर के अनेक गणमान्य नागरिक, शिक्षक एवं सैकड़ों विद्यार्थी उपस्थित रहे।
सम्मान समारोह के साथ ‘बोधकथाओं का वैश्विक परिदृश्य’ विषय पर संवाद कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। अपने विस्तृत वक्तव्य में डॉ. अमित कुमार सिंह कुशवाहा ने कहा कि बोधकथा केवल मनोरंजन की विधा नहीं, बल्कि अनुभव के माध्यम से जीवन-बोध, नैतिक विवेक और सामाजिक चेतना विकसित करने वाली महत्वपूर्ण साहित्यिक परंपरा है।
उन्होंने भारतीय कथा-परंपरा के वैश्विक प्रभाव को रेखांकित करते हुए पंचतंत्र, हितोपदेश, जातक कथाओं तथा भारतीय लोककथाओं की चर्चा की। उन्होंने बताया कि पंचतंत्र में मित्रता, संघर्ष, शक्ति, स्वार्थ, विश्वासघात और परिस्थितियों के बीच निर्णय लेने की व्यावहारिक बुद्धि दिखाई देती है। डॉ. कुशवाहा ने उन्होंने भारतीय परंपरा की तुलना विश्व की विभिन्न कथा-परंपराओं से करते हुए यूनानी ईसप की नीतिकथाओं, मध्य-पूर्व की सूफी एवं हिकमत परंपरा, ईसाई दृष्टांतों, चीनी एवं जापानी बोधकथाओं, अफ्रीकी अनांसी कथाओं, लैटिन अमेरिकी एवं आदिवासी कथा-परंपराओं तथा रूसी साहित्य की आधुनिक सामाजिक बोधकथाओं का उल्लेख किया।
डॉ. कुशवाहा ने कहा कि आज के समय में बच्चों और युवाओं के पाठ्यक्रम में बोधकथाओं की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। कथा के माध्यम से नैतिक शिक्षा को बोझिल उपदेश के बजाय सहज अनुभव में बदला जा सकता है।
हिन्दुस्थान समाचार / बृजनंदन