गौशालाओं की आत्मनिर्भरता का नया मंत्र, गोबर से ऊर्जा, गोमूत्र से मूल्यवर्धन और नवाचार से आय
लखनऊ, 24 जुलाई (हि.स.)। गौशालाओं को संरक्षण केंद्रों से आगे बढ़ाकर आत्मनिर्भरता, रोजगार और ग्रामीण उद्यमिता के केंद्रों के रूप में विकसित करने की दिशा में शुक्रवार को उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के सभागार, इन्दिरा भवन, लखनऊ में उद्यमियों, नवाचारी किसानों, गोसेवी संस्थाओं, गोसेवियों एवं गौशाला संचालकों के साथ एक महत्वपूर्ण संवाद आयोजित किया गया।
संवाद का मुख्य बिन्दु इस बात पर रहा कि गौशालाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए गोवंश से जुड़े प्रत्येक संसाधन का वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक मूल्यवर्धन कैसे किया जाए। इसमें दूध, गोबर और गोमूत्र को अलग-अलग उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि एक समग्र गो आधारित गरमाई अर्थव्यवस्था के हिस्से के रूप में विकसित करने पर विचार किया गया।
जीसीसीआई के सचिव पुरीष कुमार ने गौशालाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता का विस्तृत राजस्व मॉडल प्रस्तुत करते हुए बताया कि यदि लगभग 200 गायों वाली गौशाला में दूध, गोबर और गोमूत्र के वैज्ञानिक मूल्यवर्धन के साथ बायोगैस, जैविक खाद, प्राकृतिक कृषि इनपुट एवं अन्य गो आधारित उत्पादों से जुड़ी नवाचारी गतिविधियां संचालित की जाएं, तो एक सुव्यवस्थित मॉडल के माध्यम से दो करोड़ तक की संभावित वार्षिक आय सृजित की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि गौशालाओं को केवल अनुदान आधारित व्यवस्था के बजाय उत्पादन, मूल्यवर्धन, ब्रांडिंग और बाजार से जोड़कर राजस्व उत्पन्न करने वाले उद्यम के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। संवाद में बनासकांठा, गुजरात की गोमूत्र डेयरी के देवाराम पुरोहित ने अपना प्रेरणादायी अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि गुजरात के अबाला गांव में गोमूत्र के संग्रहण और वैज्ञानिक प्रसंस्करण को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़कर प्राकृतिक कृषि के लिए उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इस पहल के माध्यम से स्थानीय ग्रामीण परिवारों को आय का अवसर मिलने के साथ प्राकृतिक एवं रसायन मुक्त कृषि को भी बढ़ावा मिल रहा है।
शैलेन्द्र प्रताप सिंह, पूर्व पुलिस उपाधीक्षक एवं ग्राम धाम गौशाला, सिद्धपुरा, लखनऊ के संचालक ने गौशाला में विकसित बैल-आधारित विद्युत उत्पादन मॉडल की जानकारी साझा की। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय से विकसित इस पहल को उन्होंने स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में एक नवाचारी प्रयोग बताया। उन्होंने गौशालाओं को ऊर्जा उत्पादन, प्रशिक्षण एवं कौशल विकास के केंद्रों के रूप में विकसित करने की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला।
रूरल हब इनोवेशंस लिमिटेड के गौरव गुप्ता ने ग्रामीण क्षेत्रों में नवाचार, उद्यमिता एवं स्थानीय संसाधनों के मूल्यवर्धन से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने गौशालाओं और ग्रामीण युवाओं को तकनीक, बाजार एवं उद्यमिता से जोड़कर स्थानीय स्तर पर रोजगार एवं आय के नए अवसर विकसित करने की संभावनाओं पर विचार रखा।
संवाद में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि भविष्य की गौशाला केवल संरक्षण की जगह नहीं, बल्कि एक ’ग्रामीण चक्रीय जैव अर्थव्यवस्था हब’ हो सकती है। जहां गोबर से बायोगैस और स्वच्छ ऊर्जा, जैविक खाद एवं प्राकृतिक कृषि इनपुट, गोमूत्र से मूल्यवर्धित उत्पाद तथा अन्य गो आधारित उत्पाद तैयार किए जाएं और एक ही संसाधन से ऊर्जा, कृषि, रोजगार और आय के अनेक अवसर सृजित हों।
उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्त ने कहा कि गौशालाओं को केवल संरक्षण और अनुदान की दृष्टि से न देखा जाए, बल्कि उन्हें नवाचार, उद्यमिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के नए केंद्रों के रूप में विकसित किया जाए। हमारा प्रयास है कि प्रदेश की गौशालाओं में हो रहे नवाचारों को देशभर की श्रेष्ठ तकनीकों और सफल मॉडलों से जोड़ा जाए, ताकि गोवंश संरक्षण के साथ रोजगार, आय और आत्मनिर्भरता का एक स्थायी मॉडल तैयार हो सके।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. जितेन्द्र पाण्डेय