संस्कृति विश्वविद्यालय में मनाया विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस, वक्ताओं ने खुलकर बात करने और मदद लेने पर दिया जोर

 


मथुरा, 10 अक्टूबर(हि.स.)। संस्कृति विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ साइकोलॉजी की ओर से शनिवार विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि मानसिक स्वास्थ्य को भी शारीरिक स्वास्थ्य की तरह प्राथमिकता दी जानी चाहिए। किसी भी मानसिक दिक्कत को छिपाने के बजाय उस पर खुलकर बात करें और आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सा सहायता लेने में संकोच न करें।

कार्यक्रम की मुख्य वक्ता और संस्कृति स्कूल ऑफ साइकोलॉजी की डीन डॉ. मोनिका अबरोल ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता को केवल एक दिन तक सीमित न रखकर इसे निरंतर जारी रखना चाहिए। उन्होंने दोनों विभागों, आयोजकों, आंतरिक शिकायत समिति और काउंसलिंग सेल के सामूहिक प्रयासों की सराहना की। स्कूल ऑफ फैशन डिजाइनिंग की विभागाध्यक्ष डॉ. चेतना अरोड़ा ने लोगों को अपनी परेशानियों को स्वीकार करने और सामाजिक रूढ़ियों के डर से पीछे हटने के बजाय मदद मांगने के लिए प्रेरित किया। फैशन डिजाइनिंग विभाग की शिक्षिका अल्का देवी ने व्यक्तिगत समस्याओं को दोस्तों, माता-पिता और शिक्षकों जैसे भरोसेमंद लोगों के साथ साझा करने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं, मनोविज्ञान विभाग की शिक्षिका श्रुति गोस्वामी ने मनोविज्ञान के छात्रों से समाज में फैली भ्रांतियों को चुनौती देकर एक संवेदनशील समाज के निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया।

कार्यक्रम की शुरुआत साइकोलॉजी की छात्रा मनिनी शर्मा के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने संस्कृत की प्रसिद्ध कहावत मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध-मोक्षयोः के माध्यम से मन की महत्ता समझाई। इसके बाद छात्रा जिज्ञासा राजपूत ने असली आवाज़ें, असली बदलाव नाम से एक जागरूकता सत्र संचालित किया, और छात्र चैतन्य दीक्षित ने निराशा, उम्मीद और जीवन की अहमियत पर एक प्रेरणादायक हिंदी कविता सुनाई। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत मैं ठीक हूँं नामक नाटक रहा। इस नाटक के माध्यम से कॉलेज स्टूडेंट्स के उन छिपे हुए संघर्षों को प्रभावी ढंग से दिखाया गया, जो एंग्जायटी, स्ट्रेस, परफेक्शनिज़्म और भावनात्मक थकान का सामना करते हैं। नाटक ने इस आम गलतफहमी को चुनौती दी कि मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं केवल ज़्यादा सोचने या कमज़ोरी की निशानी हैं। साथ ही, बिना जज किए सुनने और क्वालिफाइड प्रोफेशनल्स से संपर्क करने के महत्व पर जोर दिया गया।

कार्यक्रम का समापन मनोविज्ञान विभाग की डीन डॉ. मोनिका अबरोल के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ।----------

हिन्दुस्थान समाचार / महेश कुमार