चित्रकूटधाम मंडल में फैली लम्पी बीमारी,गोवंश के टीकाकरण में लापरवाही पर उठे सवाल
-बरसात से पहले होना था सघन टीकाकरण, बीमारी फैलने के बाद जागा पशुपालन विभाग
बांदा, 20 सितंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश में चित्रकूटधाम मंडल के चारों जनपदों बांदा, महोबा, चित्रकूट और हमीरपुर में गोवंशों में लम्पी स्किन डिजीज (एलएसडी) के फैलने से पशुपालन विभाग की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नियमानुसार बरसात शुरू होने से करीब दो माह पहले बीमारी की रोकथाम के लिए गोवंशों का सघन टीकाकरण कराया जाना चाहिए था, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आ रही तस्वीरें और पशुपालकों के बयान विभागीय स्तर पर समय रहते प्रभावी अभियान न चलाए जाने की ओर इशारा कर रहे हैं। बीमारी फैलने के बाद अब मंडल प्रशासन ने सख्ती दिखाते हुए प्रभावित क्षेत्रों में रिंग वैक्सीनेशन के निर्देश दिए हैं।
लम्पी स्किन डिजीज विषाणु जनित संक्रामक बीमारी
इसका संक्रमण मच्छर, मक्खी और अन्य वाहक कीटों के माध्यम से तेजी से फैलता है। बीमारी की चपेट में आने वाले पशुओं के शरीर पर गांठें और चकत्ते पड़ जाते हैं तथा दुधारू पशुओं में दूध का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसे में समय से पहले टीकाकरण और संक्रमित पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
मामला संज्ञान में आने के बाद आयुक्त चित्रकूटधाम मंडल अजीत कुमार ने मंडल के चारों जिलाधिकारियों और मुख्य विकास अधिकारियों को लम्पी स्किन डिजीज की रोकथाम के लिए विशेष प्राथमिकता के साथ कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने प्रभावित गोवंश का सघन रिंग वैक्सीनेशन कराकर स्थानीय स्तर पर संक्रमण को नियंत्रित करने के निर्देश दिए हैं।
बरसात से पहले टीकाकरण, लेकिन गांवों में नहीं पहुंची टीम
बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय के सहअधिष्ठाता डॉ. शैलेंद्र चौरसिया के मुताबिक लम्पी बीमारी बरसात के मौसम में अधिक फैलती है। इसलिए बरसात शुरू होने से करीब दो माह पहले पशुओं का सघन टीकाकरण कराया जाना चाहिए। बीमारी फैलने की स्थिति में संक्रमित पशुओं को अलग रखना और पशुओं के रहने वाले स्थानों की साफ-सफाई रखना जरूरी है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आ रहे बयानों ने विभागीय दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पचनेही गांव निवासी गोलू प्रजापति ने बताया कि उनकी गाय लम्पी रोग से ग्रसित है और गांव में अब तक किसी तरह का सरकारी टीकाकरण नहीं हुआ। पशुपालक निजी डॉक्टरों और मेडिकल स्टोर से महंगी दवाएं खरीदकर इलाज कराने को मजबूर हैं।
इसी गांव के रवि का कहना है कि गांव में बड़ी संख्या में पशु बीमारी की चपेट में हैं। उनके मुताबिक सरकारी पशु चिकित्सक भी नियमित रूप से गांव नहीं आते और ग्रामीण निजी स्तर पर पशुओं का इलाज करा रहे हैं। बाबूलाल यादव ने बताया कि उनकी गाय के शरीर पर बड़े-बड़े चकत्ते पड़ गए हैं, लेकिन टीकाकरण के लिए अब तक विभागीय टीम गांव नहीं पहुंची।
लामा में बीमारी फैलने के बाद शुरू हुआ टीकाकरण
लामा गांव के प्रधान के मुताबिक गांव में बीमारी की रोकथाम के लिए पहले टीकाकरण नहीं हुआ था। शुक्रवार को पशु चिकित्सा विभाग की टीम पहुंची और टीकाकरण शुरू किया। प्रधान ने यह भी स्वीकार किया कि बीमारी से बचाव के लिए बरसात से करीब दो माह पहले टीकाकरण होना चाहिए था, लेकिन समय से अभियान नहीं चल सका। ामा के पशु स्वास्थ्य केंद्र के आसपास टीकाकरण में इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन के खाली डिब्बे नालियों में पड़े मिलने की बात भी सामने आई है। इससे विभागीय व्यवस्था और निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं।
गला घोंटू बीमारी को लेकर भी चिंता
लम्पी के साथ गोवंश में गला घोंटू जैसी गंभीर बीमारी को लेकर भी पशुपालकों में चिंता है। मंडल के विभिन्न क्षेत्रों से पशुओं में बीमारी की शिकायतों के बीच प्रशासन ने अब टीकाकरण और उपचार व्यवस्था को लेकर अधिकारियों को सक्रिय किया है। इस संबंध में अपर निदेशक पशुपालन डॉक्टर अशोक कुमार का कहना है कि वैक्सीनेशन का काम चल रहा है। उसके पहले बरसात में खुर पका मुंह पका बीमारी के लिए वैक्सीनेशन कराया गया। अचानक लम्पी की बीमारी फैलने पर अब वैक्सीनेशन का काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस मामले में पशुपालकों को भी जागरूक होना चाहिए जो अपने नजदीकी केंद्र में जाकर टीकाकरण करा सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब लम्पी बीमारी के बरसात में फैलने की आशंका पहले से रहती है और बचाव के लिए टीकाकरण का अभियान समय से पहले चलाया जाना चाहिए, तो आखिर मंडल के गांवों में समय रहते सघन टीकाकरण क्यों नहीं कराया गया? बीमारी फैलने के बाद शुरू हुई कवायद ने पशुपालन विभाग की तैयारियों और निगरानी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / अनिल सिंह