सावन की लोकपरंपरा को सहेजने का माध्यम है कजरी, नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी : मंजूबाला श्रीवास्तव

 


कानपुर, 24 अगस्त (हि.स.)। कजरी केवल सावन में गाए जाने वाला लोकगीत नहीं, बल्कि हमारी लोकपरंपरा, ग्रामीण जीवन और सांस्कृतिक विरासत की पहचान है। नई पीढ़ी को अपनी लोकसंस्कृति से जोड़ने के लिए ऐसी परंपराओं को सहेजना और आगे बढ़ाना जरूरी है। यह बातें सोमवार को बीएनएसडी शिक्षा निकेतन की उप प्रधानाचार्या मंजूबाला श्रीवास्तव ने कहीं।

बेनाझावर स्थित बीएनएसडी शिक्षा निकेतन में सावन की लोकपरंपरा, लोकसंगीत और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को समर्पित कजरी उत्सव का आयोजन किया गया। छात्राओं, शिक्षिकाओं और आमंत्रित लोक कलाकारों ने कजरी गायन, लोकनृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से सावन और ग्रामीण लोकजीवन की छटा प्रस्तुत की। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में अभिभाविकाएं मौजूद रहीं।

विद्यालय के प्रधानाचार्य बृजमोहन कुमार सिंह ने लोकगायिका कविता सिंह को स्मृति चिह्न भेंटकर स्वागत किया। उप प्रधानाचार्या मंजूबाला श्रीवास्तव ने अतिथियों और अभिभाविकाओं का स्वागत करते हुए कजरी की सांस्कृतिक एवं पारंपरिक महत्ता पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में छात्राओं ने ‘घेरि-घेरि आई सावन की बदरिया ना’ कजरी प्रस्तुत कर माहौल को सावनमय कर दिया। कक्षा 12 की छात्राओं ने सामूहिक लोकनृत्य और बुंदेलखंड की सावन कजरी-झूला प्रस्तुत कर वहां की लोकपरंपरा और ग्रामीण जीवन की झलक दिखाई।

विद्यालय की शिक्षिकाओं ने लोकगीत और एकल नृत्य प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण गुरुकुल संगीत विद्यापीठ की निदेशक एवं लोकगायिका कविता सिंह और उनके शिष्यों की प्रस्तुति रही। कलाकारों ने पारंपरिक लोकसंगीत और लोकगायन की विभिन्न प्रस्तुतियां दीं।

ढोलक पर हिमांशु निगम और की-बोर्ड पर अंश त्रिपाठी ने संगति दी। लोकगायन और वाद्य संगीत के तालमेल ने कार्यक्रम को प्रभावी बनाया।

हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप