चंद्र ग्रहण के चलते बंद रहे मंदिरों के कपाट, सड़कों पर होरियारों का रहा सन्नाटा
40 साल बाद बना योग, बुधवार को खेली जाएगी होली
झांसी, 03 मार्च (हि.स.)। जनपद में बीती रात अलग-अलग समय में पूरे 28 थाना क्षेत्र में 1376 स्थान पर होलिका दहन के कार्यक्रम आयोजित किए गए लेकिन मंगलवार को चंद्र ग्रहण के सूतक के चलते सुबह से ही मंदिरों के कपाट बंद रहे और होली भी नहीं मनाई गई। इक्का दुक्का लोग रंग गुलाल उड़ाते नजर आए। वहीं सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा।
अमूमन होलिका दहन के अगले दिन रंगोंत्सव पर्व धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन इस बार चन्द्रग्रहण के कारण ऐसा नहीं हुआ। चंद्रग्रहण के सूतक के चलते सुबह साढ़े 6 बजे से ही पूजा अर्चना के बाद मंदिरों के कपाट बंद हो गए। सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा। रंगों की होली 4 मार्च को खेली जाएगी। साल का पहला चन्द्रग्रहण मंगलवार को दोपहर 3.20 बजे से शुरु हुआ, जो शाम 5.04 बजे पूरी तरह से अलोप होना बताया गया। ग्रहण का समापन शाम 6.47 बजे हो गया। इसके पहले प्रातः 6.20 बजे से सूतक लग जाने के चलते सूतक से ग्रहण काल तक मन्दिरों के पट बन्द रहे। ग्रहण के मोक्ष होने के बाद मन्दिरों में भगवान की अर्चना करने के बाद आरती की गई । इसके बाद भगवान के दर्शन के लिए पट खोल दिए गए। वहीं पूरे दिन होली जलने के बाद भी सुबह से होली न हालांकि इसके इतर कुछेक स्थानों पर अपवाद के रूप में लोग होली खेलते भी नजर आए।
40 साल बाद बना ऐसा योग
इस संबंध में बुंदेलखंड के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य व राजराजेश्वरी देवी मां पीताम्बरा के उपासक आचार्य मनोज थापक ने बताया कि ऐसा योग 40 साल बाद बना है। उन्होंने बताया कि रंगोत्सव का कार्यक्रम बुधवार व गुरुवार को आयोजित होंगे। प्रथमा के चलते बुंदेलखंड में धूल और कीचड़ की होली खेली जाती है। वहीं दूसरे दिन यानि गुरुवार को भाई दूज के साथ ही रंगों और गुलाल की होली खेली जाएगी।
ये है कीचड़ की होली का इतिहास
होलिका दहन के बाद बुंदेलखंड में कीचड़ की होली खेलने का चलन है। इस संबंध में जानकारी देते हुए एनसाइक्लोपीडिया ऑफ बुंदेलखंड कहे जाने वाले बौद्ध शोध संस्थान के उपाध्यक्ष स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि जब भक्त प्रहलाद को बचाने के लिए भगवान ने नरसिंह अवतार लिया और हिरण्यकश्यप को मार दिया तो देवताओं और दानवों में युद्ध शुरू हो गया। जो विद्रोह शुरू हुआ उसमें जिसे जो मिला,- किसी ने कीचड़ तो किसी ने धूल आदि एक दूसरे के ऊपर डालना शुरू कर दिया। हालांकि यह युद्ध ज्यादा देर तक नहीं चल पाया और भगवान विष्णु के द्वारा हस्तक्षेप किए जाने के बाद देवताओं और दानवों में समझौता हो गया। तब यह रंगोत्सव पर्व में बदल गया और लोगों ने एक दूसरे पर रंग गुलाल डालकर होली मनाई। यही कीचड़ की होली का इतिहास है।
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हिन्दुस्थान समाचार / महेश पटैरिया