शोध: मस्तिष्क और पेट के संकेतों से 7–10 दिनों में अवसाद उपचार के परिणाम का लगेगा अनुमान
कानपुर, 31 अगस्त (हि.स.)। अवसाद के मरीज पर शुरू की गई एंटीडिप्रेसेंट दवा का असर जानने के लिए अब चार से छह सप्ताह तक इंतजार करने की जरूरत कम हो सकती है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर और गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज कानपुर के सहयोग से हुए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि मस्तिष्क और पेट की विद्युत गतिविधियों के संकेतों तथा मरीज के चिकित्सीय लक्षणों का विश्लेषण कर उपचार शुरू होने के 7-10 दिन में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि दवा प्रभावी होगी या नहीं।
अवसाद के उपचार में पहली एंटीडिप्रेसेंट दवा आधे से अधिक मरीजों पर अपेक्षित असर नहीं करती। ऐसे में दवा बदलने में कई सप्ताह लग सकते हैं। दुनिया में करीब पांच प्रतिशत वयस्क और भारत में लगभग 4.5 प्रतिशत आबादी अवसाद से प्रभावित बताई जाती है। ऐसे में शुरुआती स्तर पर उपचार की प्रतिक्रिया का अनुमान मरीज के लिए सही दवा चुनने में मददगार हो सकता है।
मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय चौधरी ने सोमवार को बताया कि उपचार के शुरुआती दिनों में दवा के प्रति मरीज की प्रतिक्रिया का आकलन महत्वपूर्ण है। यदि किसी तकनीक से कम समय में यह संकेत मिल सके कि मरीज को दवा से लाभ होने की संभावना है या नहीं, तो चिकित्सक समय रहते उपचार की रणनीति में बदलाव कर सकते हैं। इससे अप्रभावी दवा पर कई सप्ताह बिताने की समस्या कम हो सकती है।
आईआईटी कानपुर के कॉग्निटिव साइंस विभाग की सहायक प्रोफेसर और अध्ययन की कॉरस्पॉडिंग ऑथर डॉ. प्रगति प्रियदर्शिनी बालासुब्रमणि ने बताया कि उपचार के पहले सप्ताह में मस्तिष्क और पेट से प्राप्त नॉन-इनवेसिव विद्युत संकेत मरीज की संभावित उपचार प्रतिक्रिया से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। इससे उपचार को अधिक सटीक तरीके से तय करने में सहायता मिल सकती है।
शोध में मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि के लिए इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राफी (ईईजी) और पेट की विद्युत गतिविधि के लिए इलेक्ट्रोगैस्ट्रोग्राफी (ईजीजी) का इस्तेमाल किया गया। उपचार शुरू होने और करीब एक सप्ताह बाद इन संकेतों को रिकॉर्ड कर मरीजों के चिकित्सीय लक्षणों के साथ उनका विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में 206 प्रतिभागियों को शामिल किया गया, जिनमें 144 ऐसे मरीज थे जिन्होंने पहले अवसाद का उपचार नहीं कराया था। विकसित मॉडल ने उपचार से अपेक्षित लाभ न मिलने वाले मरीजों की पहचान में 84 प्रतिशत सेंसिटिविटी और 78 प्रतिशत स्पेसिफिसिटी हासिल की। स्वतंत्र मरीज समूह में मॉडल की कुल सटीकता 77.3 प्रतिशत रही।
अध्ययन के प्रथम लेखक और आईआईटी कानपुर के पीएचडी शोधार्थी अमल जूड एश्विन फ्रांसिस ने बताया कि मरीजों में अवसाद के लक्षण मस्तिष्क और पेट की अलग-अलग जैविक गतिविधियों से जुड़े हो सकते हैं। इन अंतर को समझने से व्यक्तिगत उपचार रणनीति विकसित करने में मदद मिल सकती है।
यह तकनीक फिलहाल न्यूरोक्लिनिकल इनोवेटिव सॉल्यूशंस (एनसीआईएस) प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से उपलब्ध है। परियोजना को (बीआईआरएसी) से वित्तीय सहयोग मिला है। हालांकि, व्यापक इस्तेमाल से पहले अधिक संख्या में मरीजों और अलग-अलग क्षेत्रों में आगे अध्ययन जरूरी होगा।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप