श्रद्धा और विश्वास से ही समझा जा सकता है प्रभु का चरित्र : शांतनु जी महाराज

 












दुष्टों के लिए कठोर और संतों के लिए कोमल होते हैं भगवान

गोरखपुर, 24 जुलाई (हि.स.)। प्रयागराज से पधारे श्रीराम कथा मर्मज्ञ आचार्य शांतनु जी महाराज ने कहा कि श्रीराम जी का चरित्र अपार और अगाध है। श्रीराम कथा का एक-एक अक्षर हमारे जाने-अनजाने पापों को नष्ट करने वाला है। उन्होंने बताया कि प्रभु का चरित्र श्रद्धा और विश्वास से ही समझा जा सकता है। श्रद्धा के साथ किया गया विश्वास फल देता है। भगवान के हर लीला के पीछे कोई विशेष योजना होती है। कुतर्क बुद्धि सर्वथा भक्ति के मार्ग में बाधा पैदा करती है, इसीलिए श्रद्धा और विश्वास के माध्यम से ही की गई भक्ति शुद्ध होती है।

श्री शांतनु जी महाराज, गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में श्रीगोरखनाथ मंदिर के दिग्विजयनाथ स्मृति भवन सभागार में आयोजित सप्तदिवसीय श्रीराम कथा के दूसरे दिन शुक्रवार को श्रद्धालुओं को कथा का रसपान करा रहे थे। उन्होंने कथा प्रसंग का विस्तार करते हुए कहा कि महात्मा कम पढ़ा लिखा हो सकता है पर महात्मा की बुद्धि पर परमात्मा की विशेष कृपा होती है, क्योंकि महात्मा में श्रद्धा और विश्वास ईश्वर के प्रति अटल होता है। विश्वास वटवृक्ष की तरह अटल होना चाहिए। भगवान दुष्टों के लिए कठोर और संतों के लिए कोमल होते हैं। उन्होंने कहा कि पार्वती जी जिज्ञासा स्वरूप है और सती जी संशय का स्वरूप है। जिज्ञासा का समाधान होता है और संशय का विनाश होता है इसीलिए सती माता का विनाश हुआ और पार्वती माता का समाधान हुआ।

श्री शांतनु जी ने कहा कि हमारा बाहर का शरीर संसार के कार्यों में लगा रहे किंतु हमारा भीतर का शरीर भगवान की लीलाओं में लगा रहे तभी सच्ची भक्ति होती है। गंगा में पवित्र होने के लिए चलकर जाना पड़ता है, परंतु यह राम कथा रूपी गंगा लोगों के घर घर तक जाकर उनका कल्याण करती है । उन्होंने कहा कि सगुण और निर्गुण में कोई भेद नहीं है जो इसमें भेद मानते है उनको भगवान की प्राप्ति नहीं होती। भगवान भक्त के प्रेम के वशीभूत होकर निर्गुण से सगुण रूप में आ जाते हैं। जब हम भगवान की कृपा को संयोग मानते हैं तो कृपा की अनुभूति नहीं होती।

उन्होंने कहा कि जब जब सज्जन लोग पीड़ित होते हैं, अधर्म, अन्याय, अत्याचार बढ़ता है तब-तब भगवान विविध रूपों में आकर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं। सुमति और कुमति सबके हृदय में रहतीं है परंतु हम अनुसरण किसका करते हैं यह महत्वपूर्ण है, यदि हम सुमति का अनुसरण करते हैं तो सभी प्रकार के सुख संपत्ति को प्राप्त करते हैं परंतु यदि हम कुमति का अनुसरण करते हैं तो विविध प्रकार के विपत्तियों को आमंत्रित करते हैं। कथा व्यास ने कहा कि अभिमान बहुत घातक होता है इसीलिए जो कुछ हो रहा है जब यह मान कर चलेंगे के ये सब प्रभु की कृपा से हुआ है तो अभिमान नहीं होगा। काम, क्रोध और लोभ शरीर के तब तक सद्गुण है जब तक वह नियोजित है और नियंत्रित रहे, परंतु जब ये सब अनियंत्रित होते हैं, तब दुर्गुण बन जाते हैं।

शरणागति रूप भक्ति को बताते हुए कथा व्यास ने कहा कि भक्त जब अपने आप को भगवान के चरणों में सौंप देता है, उसे अपने हानि लाभ, जीवन मरण की चिंता नहीं रहती तो भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। उन्होंने अब सौंप दिया है जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में भजन गाकर भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कहा कि जिस पर भगवान की परम कृपा होती है वही भगवान की भक्ति को प्राप्त करता है। भगवान की भक्ति मिल जाने पर भक्त को किसी और साधन तथा सुख की अपेक्षा नहीं रह जाती। प्रयाग तीर्थराज है तथा नैमिषारण्य तीर्थ वर है, जहां मनु सतरूपा ने जाकर साधना किया।

कथा व्यास ने आज की कथा में भगवान कार्तिकेय का जन्म, शिव पार्वती संवाद, नारद मोह, मनु सतरूपा साधना तथा भगवान राम के जन्म की कथा आदि का वर्णन किया। कथा का समापन आरती और प्रसाद वितरण से हुआ।

इस अवसर पर प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ जी महाराज, काली बाड़ी के महंत रविंद्र दास जी महाराज, योगी हनुमाननाथ, डॉ. प्रदीप कुमार राव, डॉ. प्रांगेश मिश्र, आचार्य बृजेश मणि मिश्र, डॉ. रंगनाथ त्रिपाठी, दयानंद शर्मा प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। संचालन डॉ. अरविंद कुमार चतुर्वेदी ने किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय