परिवारवाद के कारण क्षेत्रीय दलों में बढ़ रही टूट, लोकतंत्र में आस्था रखने वाले कार्यकर्ता अलग रास्ता चुन रहे : प्रकाश पाल

 


कानपुर, 03 जून (हि.स.)। परिवारवाद और वंशवादी राजनीति के कारण क्षेत्रीय दलों में लगातार टूट की स्थिति बन रही है। लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले कार्यकर्ता और जनप्रतिनिधि अब परिवार केंद्रित राजनीतिक व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। संगठन और कार्यकर्ताओं की भूमिका को नजरअंदाज करने वाले दलों के सामने भविष्य में और बड़ी चुनौतियां खड़ी होंगी। लोकतांत्रिक मूल्यों को महत्व देने वाले नेता ऐसे दलों से दूरी बना रहे हैं। यह बातें बुधवार को भाजपा कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र के अध्यक्ष प्रकाश पाल ने कही।

प्रकाश पाल ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में हुए हालिया घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि तृणमूल कांग्रेस के लगभग 60 विधायकों द्वारा अलग होकर अपना नेता चुने जाने की खबरें इस बात का संकेत हैं कि व्यक्तिगत और पारिवारिक वर्चस्व को लंबे समय तक स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में संगठन, कार्यकर्ता और जनप्रतिनिधियों की भूमिका सर्वोपरि होती है, जबकि परिवारवादी दलों में निर्णय कुछ लोगों तक सीमित होकर रह जाते हैं।

उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में भी शिवसेना के भीतर इसी प्रकार की स्थिति देखने को मिली थी। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व को लेकर असंतोष के बाद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक अलग हुए। इसी प्रकार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में भी अजीत पवार ने अलग राह चुनी थी।

भाजपा क्षेत्रीय अध्यक्ष ने कहा कि देश की जनता और राजनीतिक कार्यकर्ता अब वंशवाद और परिवारवाद की राजनीति से ऊब चुके हैं। वे ऐसे नेतृत्व को पसंद कर रहे हैं जो संगठन आधारित, लोकतांत्रिक और कार्यकर्ता केंद्रित हो। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी इसका उदाहरण है, जहां एक सामान्य कार्यकर्ता भी अपनी क्षमता और परिश्रम के आधार पर शीर्ष पदों तक पहुंच सकता है।

प्रकाश पाल ने कहा कि उत्तर प्रदेश में भी परिवारवाद की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी के सामने भविष्य में इसी प्रकार की चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। उनका दावा है कि लोकतांत्रिक सोच रखने वाले कार्यकर्ता और नेता परिवारवादी व्यवस्था से असंतुष्ट हैं और आने वाले समय में इसका प्रभाव राजनीतिक परिदृश्य पर दिखाई देगा।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता की इच्छा सर्वोच्च होती है। जो राजनीतिक दल लोकतांत्रिक मूल्यों से हटकर परिवार विशेष के हितों को प्राथमिकता देते हैं, उन्हें अंततः राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ता है। देश की राजनीति अब विकास, सुशासन और संगठनात्मक लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ रही है।

हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप