श्रीराम कथा ‘बाल काण्ड’ और सीताराम विवाह मनोरथ में उमड़ा आस्था का सागर

 










गोरखपुर, 02 अप्रैल (हि.स.)। रामजानकी नगर चौराहा स्थित श्री सुन्दरम् मैरेज हाउस इन दिनों भक्ति, श्रद्धा और भावनाओं के अद्भुत संगम का साक्षी बना। लोक मंजरी परिवार के संयोजन में 27 मार्च से 2 अप्रैल तक आयोजित श्रीराम कथा “बाल काण्ड” एवं श्रीसीताराम विवाह मनोरथ ने न केवल धार्मिक वातावरण को जीवंत किया, बल्कि हजारों श्रद्धालुओं के हृदय को गहराई तक छू लिया।

कार्यक्रम के प्रारंभ से ही वातावरण पूरी तरह राममय हो गया था। कथा के दौरान जब बालक राम की लीलाओं का वर्णन हुआ, तो पूरा पंडाल “जय श्रीराम” के उद्घोष से गूंज उठा। छोटे-छोटे बालकों में राम का स्वरूप देखने की प्रेरणा और परिवार में संस्कारों के महत्व को कथा व्यास ने अत्यंत सरल शब्दों में प्रस्तुत किया। यही कारण रहा कि हर वर्ग बुजुर्ग, युवा और बच्चे सभी कथा से गहराई से जुड़ते नजर आए।

कार्यक्रम का सबसे भावुक और हृदयस्पर्शी चरण 1 से 2 अप्रैल तक आयोजित श्रीसीताराम विवाह मनोरथ रहा। विवाह का मंचन इतनी भव्यता और श्रद्धा के साथ किया गया कि ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो त्रेतायुग का वह दिव्य दृश्य पुनः जीवंत हो उठा हो।

भगवान श्रीराम और माता सीता के जयमाल का दृश्य हो या विवाह की पवित्र रस्में—हर क्षण श्रद्धालुओं को भावविभोर कर रहा था। जब “सीताराम” के मंगल गीत गूंजे, तो वातावरण में एक अलौकिक ऊर्जा का संचार हुआ। महिलाओं ने मंगल गीत गाकर इस पावन आयोजन को और भी भावपूर्ण बना दिया।

विवाह के बाद जब विदाई का मार्मिक प्रसंग आया, तो पूरा पंडाल जैसे भावनाओं के सागर में डूब गया। “चल चले राम लखन भरत शत्रुघ्न...” जैसे भजनों के बीच जब माता सीता की विदाई का दृश्य प्रस्तुत किया गया, तो वहां उपस्थित हर शख्स की आंखें नम हो गईं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हर कोई अपने घर की बेटी को विदा होते देख रहा हो। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भावनाओं का ऐसा सागर था जिसमें हर कोई डूबकर अपने भीतर की संवेदनाओं को महसूस कर रहा था।

सज्जन जालान एवं डॉ. विश्वमित्र भट्ट के नेतृत्व में हुए इस आयोजन को लोगों ने अविस्मरणीय बताया। अभिभावकों ने कहा कि ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, संस्कार और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के आदर्शों को समझने का अवसर मिलता है।

श्रद्धालुओं ने भावुक होकर कहा कि इस तरह के आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, बल्कि समाज को जोड़ने, संस्कारों को जीवित रखने और जीवन में मर्यादा का संदेश देने का माध्यम होते हैं। उन्होंने आयोजकों से अनुरोध किया कि यह आयोजन हर वर्ष इसी भव्यता और श्रद्धा के साथ किया जाए।

अंत में जब कार्यक्रम का समापन हुआ, तो श्रद्धालुओं के मन में एक ओर जहां संतोष था कि उन्होंने इस दिव्य आयोजन का हिस्सा बनकर आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त की, वहीं दूसरी ओर एक हल्की सी उदासी भी थी कि यह भावनाओं से भरा पावन आयोजन अब समाप्त हो गया।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय