एक व्यक्ति, दो नाम और दो पिता! डीएम के दरबार में पहुंची शिकायत ने खोली प्रशासनिक तंत्र की पाेल

 




गोरखपुर, 09 सितंबर (हि.स.)। जनता की समस्याओं के त्वरित निस्तारण के लिए जिलाधिकारी दीपक मीणा ने बुधवार को फरियादियों की समस्याएं सुनीं। इस दौरान पिपराइच क्षेत्र से पहुंची एक महिला की शिकायत ने प्रशासनिक स्तर पर पहले से चल रहे एक गंभीर मामले को फिर चर्चा में ला दिया। महिला ने आरोप लगाया कि एक व्यक्ति अलग-अलग स्थानों पर अपनी सुविधा के अनुसार अलग नाम और पिता के नाम का इस्तेमाल कर रहा है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि संबंधित व्यक्ति द्वारा गोरखपुर में एक नाम और दूसरे प्रदेश में दूसरे नाम से नौकरी करने का मामला सामने आया है। मामले में मंडलायुक्त के निर्देश पर मुकदमा दर्ज होने और चार्जशीट दाखिल किए जाने के बावजूद स्थानीय स्तर पर संबंधित ग्राम सचिव और अन्य अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं।

फरियादी ने जिलाधिकारी को बताया कि कथित रूप से एक ही व्यक्ति अलग-अलग दस्तावेजों और स्थानों पर अलग पहचान का इस्तेमाल कर रहा है। शिकायतकर्ता के अनुसार, मामले की जानकारी प्रशासन के संज्ञान में पहले ही आ चुकी है और मंडलायुक्त स्तर से कार्रवाई के निर्देश के बाद संबंधित व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया जा चुका है। पुलिस विवेचना के बाद मामले में चार्जशीट दाखिल किए जाने की बात भी शिकायत में कही गई है।

मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि कार्रवाई के बावजूद राजस्व एवं ग्राम स्तर के अभिलेखों में कथित रूप से स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकी है। फरियादी ने आरोप लगाया कि संबंधित गांव का सचिव कथित व्यक्ति के पक्ष में अभिलेखीय प्रक्रिया को प्रभावित करने अथवा मामले को उलझाए रखने का प्रयास कर रहा है। महिला ने सवाल उठाया कि यदि एक व्यक्ति की पहचान को लेकर इतना गंभीर विवाद प्रशासन के संज्ञान में आ चुका है और मुकदमा दर्ज होकर चार्जशीट तक दाखिल हो चुकी है, तो फिर स्थानीय स्तर पर उसके पक्ष में कार्रवाई अथवा सहयोग किस आधार पर किया जा रहा है।

शिकायत सुनते समय जिलाधिकारी दीपक मीणा ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों से जानकारी ली। उन्होंने यह भी देखा कि यदि फरियादी इससे पहले भी शिकायत कर चुकी है तो उसके पूर्व में दिए गए प्रार्थना पत्रों पर क्या कार्रवाई हुई। जिलाधिकारी ने अधिकारियों से स्पष्ट रूप से जानकारी प्राप्त की कि अब तक शिकायत का निस्तारण क्यों नहीं हुआ और किन कारणों से मामला लंबित रहा।

डीएम ने संबंधित अधिकारियों को फोन कर आवश्यक दिशा-निर्देश भी दिए। उन्होंने निर्देशित किया कि फरियादी की शिकायत पर केवल कागजी निस्तारण न किया जाए, बल्कि पूरे मामले की वास्तविकता की जांच कर तथ्यात्मक रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाए। पुराने प्रार्थना पत्रों पर की गई कार्रवाई, संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट और वर्तमान स्थिति की भी जानकारी प्राप्त की जाए।

शिकायत में ग्राम सचिव की भूमिका को लेकर लगाए गए आरोपों को भी प्रशासन ने गंभीरता से लिया है। आखिर वह कौन से कारण हैं जिनकी वजह से कथित रूप से विवादित पहचान वाले व्यक्ति को स्थानीय स्तर पर सहयोग मिल रहा है? क्या ग्राम स्तर पर तैयार किए गए अभिलेख सही तथ्यों के आधार पर हैं या उनमें किसी प्रकार का बदलाव किया गया है? यदि रिकॉर्ड में विसंगति है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इन सवालों की जांच अब महत्वपूर्ण हो गई है।

महिला का आरोप है कि कथित व्यक्ति गोरखपुर में एक नाम और गैर प्रदेश में दूसरे नाम से नौकरी कर रहा है। यदि यह आरोप जांच में सही पाया जाता है तो मामला केवल ग्राम स्तर के अभिलेखों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पहचान, दस्तावेजों और नौकरी से संबंधित तथ्यों की भी जांच का विषय बन सकता है। यही वजह है कि शिकायतकर्ता ने जिलाधिकारी से पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।

शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि संबंधित ग्राम सचिव के साथ निचले स्तर के कुछ अधिकारी भी कथित व्यक्ति की मदद कर रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। प्रशासनिक स्तर पर यह जांच का विषय है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और यदि किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी ने नियमों के विपरीत किसी व्यक्ति को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया है तो उसकी भूमिका क्या है।

इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मामला मंडलायुक्त स्तर तक पहुंचा, मुकदमा दर्ज हुआ और चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है, तब स्थानीय स्तर पर शिकायत के समाधान में देरी क्यों हुई? जिलाधिकारी द्वारा पुराने प्रार्थना पत्रों की स्थिति और कार्रवाई का विवरण मांगे जाने के बाद संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होने की संभावना बढ़ गई है।

डीएम के जनता दर्शन में इस तरह की शिकायतों को प्राथमिकता से सुनना प्रशासन की कार्यप्रणाली में जवाबदेही का संकेत माना जा रहा है। खास तौर पर दोबारा शिकायत लेकर पहुंचने वाले फरियादियों के मामलों में जिलाधिकारी यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि पूर्व में दिए गए प्रार्थना पत्रों पर वास्तव में क्या कार्रवाई हुई। इससे केवल शिकायतकर्ता को जवाब मिलने की उम्मीद नहीं है, बल्कि संबंधित विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली की भी समीक्षा हो रही है।

पिपराइच क्षेत्र के इस मामले में अब निगाहें प्रशासनिक जांच पर टिकी हैं। एक व्यक्ति की कथित दो पहचान, अलग-अलग पिता के नाम का इस्तेमाल, मुकदमा और चार्जशीट के बाद भी स्थानीय स्तर पर विवाद का बने रहना तथा ग्राम सचिव और अन्य अधिकारियों पर लगाए गए सहयोग के आरोप ने पूरे प्रकरण को गंभीर बना दिया है। यदि जांच में शिकायतकर्ता के आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।

फिलहाल प्रशासन की ओर से शिकायत में लगाए गए सभी आरोपों की पुष्टि नहीं की गई है। लेकिन जिलाधिकारी द्वारा मामले में पुराने प्रार्थना पत्रों की कार्रवाई, देरी के कारण और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जानकारी मांगे जाने से साफ है कि प्रकरण को अब केवल एक सामान्य शिकायत मानकर टालने के बजाय रिकॉर्ड और जिम्मेदारी के स्तर पर जांचने की कवायद शुरू हो गई है।

हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय