फसल अवशेष प्रबंधन से घटती है रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता : डॉ. खलील खान
कानपुर, 14 जनवरी (हि.स.)। फसल अवशेष प्रबंधन का बहुत ही महत्व है, क्योंकि यह मिट्टी के स्वास्थ्य को सुधारता है। मृदा अपरदन रोकता है, पानी के रिसाव को बढ़ाता है, मिट्टी के तापमान को नियंत्रित करता है, प्रदूषण कम करता है, और पोषक तत्वों को लौटाता है। यही नहीं रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी घटती है और खेती लागत कम होती है, जो टिकाऊ कृषि के लिए जरुरी है। यह बातें सीएसए के मृदा वैज्ञानिक डॉ. खलील खान ने किसानों को प्रशिक्षण देते हुए कही।
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर के अधीन संचालित कृषि विज्ञान केंद्र दिलीपनगर पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन 13 से 17 जनवरी तक किया जा रहा है। आज दूसरे दिन बुधवार को केंद्र के उद्यान वैज्ञानिक डॉ अरुण कुमार सिंह ने बताया कि फसल अवशेष प्रबंधन से किसान को कम लागत में बेहतर उपज व मृदा स्वास्थ्य मिलता है, जो टिकाऊ कृषि के लिए जरूरी है। वैज्ञानिक डॉ राजेश राय ने बताया कि फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) एक ऐसी रणनीति है जो जुताई की आवृत्ति और तीव्रता को कम करने और पिछली फसलों के बचे हुए अवशेषों की मात्रा बढ़ाने पर आधारित है। इस प्रबंधन पद्धति का लक्ष्य मिट्टी और जल की गुणवत्ता का संरक्षण करते हुए कई अन्य पारिस्थितिक और आर्थिक लाभ प्रदान करना है।
गृह वैज्ञानिक डॉ निमिषा अवस्थी ने बताया कि फसल और मिट्टी का प्रकार, जलवायु और खेती के तरीके, ये सभी इस बात में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं कि फसल अवशेष प्रबंधन पर्यावरण के लिए कितना फायदेमंद है।
केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ शशिकांत ने किसानों से कहा कि पशुपालन में फसल अवशेष (जैसे भूसा, डंठल) बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये पशुओं के लिए सस्ता और सुलभ चारा प्रदान करते हैं। सूखे चारे की कमी पूरी करते हैं और पानी व उर्वरक की बचत करके लागत कम करते हैं, साथ ही इन्हें जलाने से रोककर पर्यावरण प्रदूषण (धुआं, ग्रीनहाउस गैसें) और मिट्टी के स्वास्थ्य (पोषक तत्व) में सुधार होता है। कार्यक्रम में 25 कृषकों ने भाग लिया।
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हिन्दुस्थान समाचार / अजय सिंह