डॉ. अम्बेडकर के आदर्शों को अपनाकर ही समावेशी समाज का निर्माण संभव : प्रो. बद्री नारायण तिवारी
लखनऊ, 13 अप्रैल (हि.स.)। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में ‘अम्बेडकर जयंती’ तथा ‘विश्वविद्यालय स्थापना दिवस’ के अवसर पर साेमवार को 'उद्यमिता से समावेशी विकास: बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की दृष्टि मेंं' विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
मुख्य अतिथि टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुम्बई के कुलपति प्रो. बद्री नारायण तिवारी ने कहा कि मानव शरीर सबसे जटिल संरचना है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने गुणों का संचय करते हुए अपने व्यक्तित्व का पुनर्संगठन करना चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि हमें पुनर्विचार करने की आवश्यकता है कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर के आदर्श और संदेश क्या हैं। क्योंकि उन्हीं आदर्शों को अपनाकर ही एक समावेशी समाज का निर्माण संभव है। उनके अनुसार विकास एक सतत गति की प्रक्रिया है, अतः नीति-निर्माताओं को इस प्रकार कार्य करना चाहिए कि विकास की धारा में समाज के प्रत्येक वर्ग को समान रूप से शामिल किया जा सके। इसके लिए आवश्यक है कि वे समाज से जुड़कर लोगों की भावनाओं और संवेदनाओं को समझें और उसी के अनुरूप नीतियाँ बनाएं।
प्रो. तिवारी ने उद्यमिता को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया और कहा कि उद्यमिता से ज्ञान का सृजन होता है, जो सशक्तिकरण को नई दिशा प्रदान करता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि समाज के प्रत्येक वर्ग में कुछ बेहतर करने की अपार संभावनाएं निहित हैं। गरीब वर्ग को उन्होंने सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बताया तथा यह उल्लेख किया कि वंचित समुदाय अपने संस्कृति और परम्पराओं के प्रति अधिक जागरूक होते हैं। अंत में उन्होंने सभी से आह्वान किया कि वे अपने-अपने स्तर पर पहल करें और विकसित भारत के सपने को साकार करने की दिशा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दें।
अध्यक्षता कर रही विश्वविद्यालय की कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा ने डॉ. अम्बेडकर को आधुनिक भारत और सामाजिक न्याय का शिल्पकार बताया। उन्होंने कहा कि बाबासाहेब ने एक नए भारत का वैचारिक ब्लूप्रिंट प्रस्तुत किया, जिसमें समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को केंद्र में रखा गया। उन्होंने विधिक और सामाजिक अवधारणाओं की मजबूत नींव रखी तथा विश्व की श्रेष्ठ लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से प्रेरणा लेकर भारतीय संविधान का निर्माण किया। एक दूरदर्शी सामाजिक सुधारक के रूप में उन्होंने संविधान को केवल एक कानूनी दस्तावेज न बनाकर उसे समाज परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनाया, जिससे हर वर्ग को न्याय और अधिकार मिल सके।
स्थायी आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो. के.एल. महावर ने कार्यक्रम के बारे में बताते हुए कहा कि विश्वविद्यालय निरंतर बाबासाहेब के विचारों को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहा है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय विभिन्न शैक्षणिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से अम्बेडकर के समता, न्याय और मानवाधिकार संबंधी सिद्धांतों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है।
दलित इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष मनीष वर्मा ने बताया कि यह संस्था वंचित एवं हाशिये पर रहे समुदायों को उद्यमिता के माध्यम से सशक्त बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि आज ऐसे वर्गों के लोग व्यापार एवं उद्योग के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं, जो पहले मुख्यधारा से दूर थे। उन्होंने इस सकारात्मक परिवर्तन को सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए इन उभरते उद्यमियों के प्रयासों की सराहना की तथा कहा कि डिक्की का उद्देश्य रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के साथ-साथ एक आत्मनिर्भर और समावेशी समाज का निर्माण करना है।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. जितेन्द्र पाण्डेय