उच्च शिक्षा में पारम्परिक ज्ञान और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों का संतुलित समन्वय आवश्यक : डॉ अतुल कोठारी
-स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को उच्च शिक्षा में पुनः स्थापित और समाहित करने की आवश्यकता : डॉ कोठारी-ट्रिपल आईटी के निदेशकों ने ‘भारतीय ज्ञान परम्परा’ आधारित पाठ्यक्रम विकसित करने पर किया मंथन
प्रयागराज,25 अप्रैल (हि.स)। उच्च शिक्षा में भारतीय विज्ञान के समावेशन के लिए पारम्परिक ज्ञान और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों का संतुलित समन्वय आवश्यक है। पाठ्यक्रम ढांचे को अंतर्विषयक दृष्टिकोण अपनाते हुए प्राचीन ग्रंथों को आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांतों के साथ जोड़ना चाहिए।
उक्त विचार शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के सचिव डॉ.अतुल भाई कोठारी ने शनिवार को भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान इलाहाबाद के झलवा परिसर में आयोजित एक संगोष्ठी में कही। वह देश के भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों के निदेशकों की दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में भारतीय ज्ञान परम्परा (बीकेटी) को पाठ्यक्रम में समाहित करने संबंधित विषय पर उद्घाटन सत्र को सम्बोधित किए।
डॉ कोठारी ने कहा कि वेदों और आधुनिक शोध पद्धतियों का मेल पाठ्यक्रम को गहराई और विविधता प्रदान करता है। इस दिशा में आयुर्वेद, योग और खगोल विज्ञान जैसे विषयों को शामिल कर विद्यार्थियों को उनकी समकालीन प्रासंगिकता से परिचित कराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि 'तेजी से बदलते शैक्षिक परिदृश्य में स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को उच्च शिक्षा में पुनः स्थापित और समाहित करने की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है।'
डॉ.कोठारी ने भारतीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण के मूल स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि,वर्तमान प्रासंगिकता तथा आधुनिक शिक्षा को समृद्ध करने की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने पाठ्यक्रम में इसके समावेशन के लिए व्यावहारिक उपायों और सफल उदाहरणों का उल्लेख करते हुए संस्थानों के लिए एक मार्गदर्शी रूपरेखा प्रस्तुत की,जिससे एक समग्र, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और वैज्ञानिक दृष्टि से सुदृढ़ शैक्षिक ढांचा विकसित किया जा सके।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि ऐसा पाठ्यक्रम विकसित किया जाए जो भारतीय वैज्ञानिक चिंतन को प्रतिबिंबित करे। जिसमें प्रकृति,मानव और ब्रह्मांड के बीच सामंजस्य पर जोर दिया जाता है। यह जिज्ञासा, समालोचनात्मक सोच और विचारों की विविधता को प्रोत्साहित करता है तथा ज्ञान को समाज के उत्थान का माध्यम मानने वाली प्राचीन भारतीय परम्परा को आगे बढ़ाता है। इसके प्रमुख तत्वों में जिज्ञासा-आधारित अधिगम,आध्यात्मिक और भौतिक ज्ञान का समन्वय तथा रटने के बजाय अनुभवात्मक शिक्षा पर जोर शामिल है।
ट्रिपल आईटी इलाहाबाद के निदेशक प्रो.मुकुल शरद सुतावाने ने इस अवसर पर ट्रिपल आईटी ग्वालियर,जबलपुर,नया रायपुर,लखनऊ,भागलपुर,रांची, सोनीपत,पुणे,ऊना,एमएनएनआईटी इलाहाबाद सहित विभिन्न ट्रिपल आईटी के निदेशकों और प्रतिनिधियों का स्वागत किया।
उन्होंने बताया कि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय ज्ञान निधि (बीकेटी) को पाठ्यक्रम स्तर पर विभिन्न शैक्षणिक क्षेत्रों जैसे बेसिक साइंसेज, मटेरियल साइंस, गणित, भाषाएं, कम्प्यूटर साइंस एवं इंजीनियरिंग, सूचना प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग, डिजाइन एवं मैन्युफैक्चरिंग तथा प्रबंधन में प्रभावी ढंग से समाहित करना है।
विशिष्ट अतिथि आईआईटी हैदराबाद के निदेशक एवं ट्रिपल आईटी कर्नूल के कार्यवाहक निदेशक प्रो.बी.एस.मूर्ति ने बताया कि भारतीय विरासत के समावेशन पर केंद्रित एम.टेक कार्यक्रम पिछले चार वर्षों से सफलतापूर्वक संचालित किया जा रहा है।
आईआईटी कानपुर समन्वयक डॉ.अर्नब भट्टाचार्य ने कम्प्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स और पाणिनि के व्याकरण पर व्याख्यान देते हुए उनकी आधुनिक शोध में प्रासंगिकता बताई। वहीं आईटी, बीएचयू के डॉ. रुचिर गुप्ता ने भारतीय ज्ञान प्रणाली केंद्र की गतिविधियों और पाठ्यक्रम संबंधी पहलों पर प्रकाश डाला।
इसके बाद ट्रिपल आईटी के निदेशकों की एक पैनल चर्चा आयोजित की गई। जिसमें विभिन्न संस्थानों में भारतीय ज्ञान निधि की वर्तमान स्थिति पर संक्षिप्त विचार साझा किए गए। इस चर्चा में प्रो. एस.एन. सिंह (ग्वालियर), प्रो. भारतेंदु सिंह (जबलपुर), प्रो. राजीव श्रीवास्तव (रांची), प्रो. विनीत कंसल (पुणे), प्रो. मनीषा शर्मा (सोनीपत), प्रो. मधुसूदन सिंह (भागलपुर), प्रो. ओ.पी. व्यास (नया रायपुर), प्रो. मनीष गौर (ऊना) और प्रो. अरुण मोहन शैरी (लखनऊ) प्रमुख रूप से शामिल रहे।
ट्रिपल आईटी के पीआरओ डॉ पंकज मिश्र ने बताया कि अंत में आईआईटी मंडी के डॉ.वेंकटेश चेम्ब्रोलु ने चेतना और कल्याण पर आधारित समन्वित पाठ्यक्रम विकास पर व्याख्यान दिया। जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ. प्रीति जगवानी ने प्राचीन भारतीय गणित पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम का समापन 26 अप्रैल को समापन सत्र में प्रस्ताव पारित किए जाने के साथ होगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र