पश्चिम बंगाल की ऐतिहासिक जीत ने भाजपा के लिये आसान की उप्र विधानसभा चुनाव की राह

 


लखनऊ, 04 मई (हि.स.)। पश्चिम बंगाल की ऐतिहासिक जीत और असम में तीसरी बार और पुड्डुचेरी में दूसरी बार भाजपा सरकार की बनने के उत्साह ने भाजपा को 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की आसान जीत का रास्ता दिखा दिया है। यहां टुकडों में बंटे विपक्ष की धार न केवल कुंद होने वाली है बल्कि आपस में टकराव भी बढ़ने वाला है। ऐसे में भाजपा की राह में कांटे में कम होंगे लेकिन इसके लिए सबका साथ सबका विकास के मंत्र को अधिक मजबूती के साथ दोहराना होगा।

देश के पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरलम, असम और पुड्डूचेरी में मतदान के बाद एक्जिट पोल आने शुरु हो गये थे। इनमें सबसे अधिक उलटफेर पश्चिम बंगाल को लेकर था, क्योंकि ममता सरकार ने 15 साल से अपने मतदाताओं खासकर मुस्लिम समुदाय को सहेज कर रखा था। इसके लिए जायज और नाजायज मांगों को पूरा करने के साथ-साथ उनके हर नखरे को सिर माथे पर रखा और इस चुनाव में अपने कोर वोटबैंक के लिए उनके धर्म को अपने दिल में उतारा। इसके बावजूद एक्जिट पोल में जब भाजपा की संभावित सरकार बनती दिखायी दी तो समूचे विपक्ष ने इसे एक स्वर से नकार दिया, लेकिन आज चार मई को जब परिणाम सामने आये तो नये राजनीतिक समीकरण बन गये। आपातकाल के बाद पश्चिम बंगाल में बामपंथी दलों ने कांग्रेस को उखाड़ फेंक कर अपनी सत्ता बनायी और इसके 34 साल बाद वर्ष 2011 में ममता ने वामपंथ को उखाड़ कर अपनी सत्ता बनाई और अब वर्ष 2026 में भाजपा ने ममता सरकार को सत्ता से बाहर खुद को स्थापित किया।

भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल की जीत आसान नहीं थी लेकिन दृढ़ता और वैचारिक आंदोलन के सहारे संघ परिवार की ताकत ओर तपतपाये स्वयंसेवकों के त्याग ने यह राह आसान कर दी। गौर करें तो वर्ष 2011 में विधानसभा चुनाव में भाजपा की एक भी सीट नहीं थी, लेकिन कुछ सीटों पर उपविजेता जरूर रही। वर्ष 2016 में पहली बार तीन सीटें जीती और वर्ष वर्ष 2021 में 77 सीटें जीती। इसके बाद वर्ष 2026 में 200 से अधिक सीटें जीत कर इतिहास रच दिया। यही राजनीतिक कौशल है कि संघ ने एक ऐसी मूक क्रांति कर दी कि पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी की बंगभूमि में जय श्री राम के नारे लग रहे हैं। इस जीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह समेत शीर्ष नेतृत्व के साथ—साथ उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और कई अन्य नेताओं का भी योगदान रहा है।

पांच में से तीन राज्यों में भाजपा की सरकार के गठन का रास्ता साफ होने से अब वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश की चुनाव राह आसान होने जा रही है। इसकी वजह यह है बिखरा और परिवारवादी विपक्ष के आपसी हितों का टकराव, उत्तर प्रदेश में कमजोर होने के बावजूद कांग्रेस सपा प्रमख अखिलेश यादव के साथ ऐसी सौदेबाजी करती है कि जैसे समाजवादी पार्टी जूनियर पार्टनर हो, जबकि अपना दल कमेरावादी की नेता पल्लवी पटेल वैसे तो एमएलए समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्रन पर हैं लेकिन वे पार्टी की नहीं अपनी पार्टी की नीति से चलती हैं, अन्य कई छोटे-छोटे दल भी महागठबंधन से इतर अपनी भविष्य तलाश रहे हैं तो बसपा पहले से ही एकल चलो की राह पर है, समाजवादी पार्टी के कई विधायक पहले ही भाजपा के समर्थन में हैं।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझेदारों की बात करें तो उत्तर प्रदेश में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया ओम प्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के मुखिया डा संजय निषाद भाजपा की लय में हैं। इन दोनों नेताओं की न केवल सत्ता में हिस्सेदारी है बल्कि वे हाल ही में नारी शक्ति वंदन कार्यक्रम में भी मुख्यमंत्री के साथ नजर आये। कहना उचित है कि यह साफ संकते है कि वर्ष 2027 के चुनाव में यह गठबंधन जारी रहेगा और यही सत्ता मेंं वापसी तय करेगा।

वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में अब एक साल से कम समय बचा है। फरवरी—मार्च 2027 में विधानसभा चुनाव होंगे। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने वर्ष 2018 में समाजवादी पार्टी को सत्ता से हटाकर प्रचंड बहुमत से सरकार बनायी थी। इसके बाद वर्ष 2022 में पुन: सरकार बनायी। अब वर्ष 2027 में भाजपा हैट्रिक बनाने के लिए काम कर रही है। भाजपा ने वर्ष हैट्रिक के लिए व्यापक रणनीति तैयार की है, चुनावी प्रबंधन से इतर भाजपा ने अपने संगठन को पुनर्गठित कर दिया है, जिला इकाइयां गठित होने के साथ काम शुरु कर चुकी हैं। इनका पहला बड़ा कार्यक्रम नारी शक्ति वंदन का लेकर हुआ है और इसके साथ जिला स्तर पर इसी मुद्दे पर प्रेस कांफ्रेंस, जन आक्रोश रैली जैसे कई कार्यक्रम हुए हैं। एक तरह से विधानसभा चुनाव की तैयारियां गति पकड़ रही हैं।

पश्चिम बंगाल और असम की जीत से उप्र के विधानसभा चुनाव पर पड़ने वाले असर पर लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर संजय गुप्ता कहना है कि सभी चुनाव इंटरकनेक्टेड होते हैं। इसलिए न केवल उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा बल्कि लोकसभा चुनाव पर भी पडे़गा। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंंगाल में भाजपा की जीत न केवल राष्ट्रवाद की जीत है बल्कि पश्चिम बंगाल के लोगों द्वारा ममता सरकार की तुष्टिकरण की पराकाष्ठा से आजिज होकर अपनी संस्कृति को बचाने के लिए किये गये अभियान की जीत है। उन्होंने कहा कि भाजपा तुष्टिकरण किसी का नहीं विकास सबका वाले मंत्र में यकीन करती है। इस चुनाव में पीडीए भी पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है और असम में भाजपा की तीसरी बार सरकार आने का मतलब है कि भाजपा विकास और राष्ट्रवाद की पक्षधर है।

प्रोफेसर गुप्ता का कहना है कि वर्ष 1977 के बाद वामपंथ और ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की संस्कृति को बिगाड़ने का काम किया है जबकि पश्चिम बंगाल ने समाज के हर क्षेत्र में एक से बढ़कर एक हस्तियां पेदा की हैं, लेकिन उसी धरती पर ममता बनर्जी ने तुष्टिकरण का ऐसा खेला किया कि सनातन धर्म मानने वाले लोगों को अपनी संस्कृति बचाने के लिए अत्याचार तक सहने पडे़, लेकिन अब हालात जरूर बदलेंगे और उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में इस जीत का सकारात्मक संदेश जायेगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / शिव सिंह