स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर बीएचयू में जीवंत हुई नौटंकी, ‘सत्य हरिश्चंद्र’ का मंचन
—सत्य, साहस, त्याग और स्वतंत्रता के शाश्वत मूल्यों को मंच पर किया प्रस्तुत
वाराणसी, 14 अगस्त (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में शुक्रवार शाम पारंपरिक नौटंकी की जीवंतता देखने को मिली। सत्य, साहस, त्याग और स्वतंत्रता के शाश्वत मूल्यों को केंद्र में रखकर संगीतमय नाटक ‘सत्य हरिश्चंद्र’ का प्रभावी मंचन पंडित ओंकारनाथ ठाकुर सभागार में किया गया। रंगशाला, विश्वविद्यालय थिएटर सेल ने संगीत एवं मंच कला संकाय तथा कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी, फ्रेस्नो, अमेरिका के सहयोग से यह प्रस्तुति दी।
—प्रो. देवेंद्र शर्मा ने किया निर्देशन
नाटक का निर्देशन कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में कम्युनिकेशंस के प्रोफेसर और सातवीं पीढ़ी के संगीत कलाकार प्रो. देवेंद्र शर्मा ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर और बीएचयू के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमाओं पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया।
कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर ‘सत्य हरिश्चंद्र’ का मंचन विशेष रूप से प्रासंगिक है। उन्होंने राजा हरिश्चंद्र के चरित्र में निहित सत्यनिष्ठा, नैतिक साहस, त्याग और विपरीत परिस्थितियों में दृढ़ रहने की भावना को रेखांकित किया। उन्होंने इन आदर्शों को स्वतंत्रता और राष्ट्र-निर्माण से जुड़े व्यापक मूल्यों के संदर्भ में भी देखा।
—अमेरिका में नौटंकी को दे रहे नई पहचान
प्रस्तुति से पूर्व निर्देशक प्रो. देवेंद्र शर्मा ने नाटक की विषयवस्तु और इसकी विशेषताओं पर विचार रखे। उन्होंने दुनिया भर में सांगीत-नाट्य की 1,000 से अधिक प्रस्तुतियां दी हैं। अमेरिका में नौटंकी मंडली की स्थापना कर उन्होंने अनेक प्रस्तुतियों का निर्देशन किया है। पेरिस के विश्वप्रसिद्ध थिएटर दु सोलेई ने भी उन्हें अपने कलाकारों को नौटंकी का प्रशिक्षण देने के लिए आमंत्रित किया था। वह प्रतिवर्ष राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देते हैं।
—लोक-नाट्य परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ना उद्देश्य
रंगशाला के समन्वयक प्रो. संजय कुमार ने कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी, विशिष्ट अतिथि चारु चतुर्वेदी, निर्देशक प्रो. देवेंद्र शर्मा सहित अन्य अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि संगीत, स्वांग और नौटंकी से जुड़ी लोक-नाट्य परंपरा संगीत, काव्य, अभिनय, नृत्य और लोकभाषा के अद्भुत समन्वय के लिए जानी जाती रही है। कभी यह भारतीय जनजीवन का अत्यंत जीवंत और लोकप्रिय हिस्सा थी, लेकिन मनोरंजन के नए माध्यमों के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे सांस्कृतिक जीवन से दूर होती गई। उन्होंने कहा कि रंगशाला का उद्देश्य युवा पीढ़ी को इस समृद्ध विरासत से परिचित कराना, उससे जोड़ना और इसे नए रूप में आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करना है।
—संगीत शैली के साथ आधुनिक मंचीय रूप
संगीत, अभिनय, संवाद और पारंपरिक सांगीत शैली के समन्वय से तैयार प्रस्तुति में नौटंकी की पारंपरिक विशेषताओं को बरकरार रखते हुए उसे आधुनिक दर्शकों के लिए नए मंचीय रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रस्तुति ने नौटंकी की जीवंतता, कथात्मक क्षमता और समकालीन संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता को प्रभावी ढंग से सामने रखा।
—मंच पर दिखी ‘लघु भारत’ की झलक
इस मंचन की खासियत यह रही कि इसमें केवल हिंदी पट्टी, बिहार और उत्तर प्रदेश के विद्यार्थियों ने ही हिस्सा नहीं लिया, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्यार्थियों की भागीदारी ने इसे ‘लघु भारत’ का स्वरूप दिया। असम और गुजरात से आई छात्राओं के साथ महाराष्ट्र, कर्नाटक और सुदूर दक्षिण के पुडुचेरी से बीएचयू में पढ़ने आए विद्यार्थियों ने भी विभिन्न भूमिकाएं निभाईं। इससे प्रस्तुति में देश की विविध सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों की झलक देखने को मिली।
—इन कलाकारों ने निभाई प्रमुख भूमिकाएं
नाटक में तरुण सिंह भदौरिया और प्रियांशु शुक्ला ने हरिश्चंद्र, सिफारिश और धीरज सेन ने विश्वामित्र तथा रितुल और अम्रपाली शर्मा ने तारावती की भूमिका निभाई। रितिका सिंह ने तारावती के साथ-साथ विष्णु की भूमिका भी निभाई। प्रस्तुति के माध्यम से सत्य, साहस, त्याग और स्वतंत्रता के मूल्यों को दर्शकों तक पहुंचाते हुए नौटंकी की पारंपरिक विरासत को नए दर्शक-वर्ग से जोड़ने का प्रयास किया गया।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी