दिगंबर जैन मंदिर में पर्युषण पर्व का शुभारंभ, निकली भव्य शोभायात्रा

 


11 दिवसीय अनुष्ठान में शामिल हो रहे देशभर से हजारों श्रद्धालु

अयोध्या, 17 सितंबर (हि.स.)। जैन धर्म में पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि, संयम और आराधना का महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। रायगंज स्थित दिगंबर जैन मंदिर में 11 दिवसीय पर्युषण पर्व का विधिवत शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर मंदिर परिसर से भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें इंद्र-इंद्राणी के स्वरूप, प्रतीकात्मक ऐरावत हाथी, रथ पर विराजमान जिन प्रतिमा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।

शोभायात्रा में 92 वर्षीय गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता, प्रज्ञाश्रमणी चंदनामती माता, पीठाधिपति रवींद्रकीर्ति स्वामी, संघपति अनिलकुमार जैन, प्रतिष्ठाचार्य विजयकुमार जैन और जैन युवा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. जीवनप्रकाश समेत प्रमुख संत एवं श्रद्धालु शामिल रहे। इंद्र-इंद्राणी के स्वरूप में नीतीश कुमार जैन और उनकी पत्नी शालिनी जैन शामिल हुए। महिलाएं कलश और ध्वज लेकर यात्रा में चल रही थीं।बैंड की धुन और धार्मिक गीतों के बीच शोभायात्रा रामजन्मभूमि मार्ग से होते हुए वापस जैन मंदिर पहुंची। इसके बाद मंदिर परिसर के विशाल आगार में 1008 वेदिकाओं पर इंद्र ध्वज पूजन का शुभारंभ हुआ। पौराणिक आख्यान के अनुरूप श्रद्धालुओं ने इंद्र-इंद्राणी, कुबेर, वरुण और यम आदि के स्वरूपों की पूजा-अर्चना के लिए संकल्प लिया।

धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत पवित्र मंत्रोच्चार और संकल्प के साथ हुई। पीठाधीश स्वीद्रकीर्ति स्वामी ने कहा कि तीर्थंकरों ने धर्म के जो दस लक्षण बताए हैं, अगले 11 दिनों में श्रद्धालुओं को उन्हें आत्मस्थ करने का प्रयास करना है। पर्युषण पर्व आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक ऊर्जा को नवीनता प्रदान करने का अवसर है। क्षमा से शांत होता है क्रोध पर्युषण पर्व के प्रथम प्रवचन सत्र में गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता ने कहा कि दशलक्षण पर्व का प्रारंभ क्षमा धर्म से होता है। आचार्यों ने क्रोध को अग्नि की उपमा दी है और उसे शांत करने के लिए क्षमारूपी जल ही समर्थ है। उन्होंने कहा कि सज्जन व्यक्ति अपनी सहनशीलता से ही चमकते हैं। क्षमा और संयम के माध्यम से व्यक्ति अपने अंतस को शुद्ध कर सकता है।

हिन्दुस्थान समाचार / पवन पाण्डेय