एआई अब केवल पढ़ाई नहीं, विद्यार्थियों की सोच और आत्मविश्वास भी तय कर रहा है : कुलपति
कानपुर, 26 मई (हि.स.)। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीक अब केवल पढ़ाई का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि यह विद्यार्थियों की सोच, आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता को भी प्रभावित कर रही है। इसलिए इसके सुरक्षित, संतुलित और नैतिक उपयोग को समझना बेहद जरूरी है। यह बातें मंगलवार को छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने विश्वविद्यालय में हुए एक शोध अध्ययन के संबंध में कहीं।
सीएसजेएमयू के शिक्षा विभाग में एआई और शिक्षा से जुड़े विषय पर एक महत्वपूर्ण शोध किया गया। विभाग के सहायक आचार्य डॉ. विमल सिंह के निर्देशन में छात्रा मानसी सिंह ने ‘एल्गोरिदमिक बायस ऑन इंटरसेक्शनल आइडेंटिटीज’ विषय पर शोध किया। शोध में विशेषज्ञ के रूप में डॉ. अंशु सिंह का योगदान रहा। अध्ययन में 211 स्नातकोत्तर विद्यार्थियों और सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों को शामिल किया गया।
शोध में सामने आया कि एआई तकनीक विद्यार्थियों के लिए नई संभावनाएं खोल रही है, लेकिन कई बार यही तकनीकें कुछ विद्यार्थियों को अधिक और कुछ को कम अवसर देती दिखाई देती हैं। अध्ययन के दौरान यह भी पाया गया कि शहरी विद्यार्थी एआई में मौजूद पक्षपात को जल्दी पहचान लेते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र के कई विद्यार्थी समस्याओं को महसूस तो करते हैं, लेकिन उन्हें स्पष्ट रूप से समझ नहीं पाते। शोधकर्ताओं ने इसे “कॉन्शियस डिवाइड” नाम दिया।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि एमएड के विद्यार्थी तकनीक के सामाजिक और नैतिक प्रभावों को लेकर अधिक जागरूक हैं। वहीं कई विद्यार्थियों ने कहा कि एआई आधारित रिसर्च टूल विज्ञान और तकनीकी विषयों के लिए अधिक उपयोगी साबित हो रहे हैं, जबकि कला और सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थियों को अपेक्षाकृत कम सहायता मिलती है।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों में “क्रिटिकल एआई लिटरेसी” की शुरुआत की जानी चाहिए, ताकि विद्यार्थी एआई के काम करने के तरीके और उसके सही उपयोग को समझ सकें। साथ ही ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए विशेष डिजिटल जागरूकता कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता भी बताई गई।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप