अभिनेता राजपाल यादव ने माघ मेले में किया पार्थिव शिवलिंग निर्माण

 


--संगम तट पर अभिनेता राजपाल यादव ने दिखाया श्रद्धा भाव, भक्ति गीतों पर झूमे

--डॉ. अनिल प्रभाकर शास्त्री के सानिध्य में बोले-यह आस्था नहीं, श्रद्धा की पराकाष्ठा है

प्रयागराज, 14 जनवरी (हि.स.)। महाकुम्भ के पश्चात माघ मेला अब धर्म, आस्था और अध्यात्म का महासंगम बन चुका है। संगम की पावन रेती पर बसे तंबुओं के इस आध्यात्मिक नगर में देश के कोने-कोने से साधु-संत, श्रद्धालु और कल्पवासी पहुंच रहे हैं। आम श्रद्धालुओं के साथ-साथ अब देश की जानी-मानी हस्तियां भी माघ मेले में आस्था की अनुभूति के लिए पहुंच रही हैं।

इसी क्रम में बुधवार काे बॉलीवुड के प्रसिद्ध कॉमेडी अभिनेता राजपाल यादव माघ मेले में पहुंचे और संगम में पुण्य स्नान कर आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त की। इसके पश्चात उन्होंने सेक्टर-6 स्थित पूज्य गुरुदेव पं. देवप्रभाकर शास्त्री “दद्दा जी” की पुण्य स्मृति में आयोजित धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता निभाई।

डॉ. अनिल प्रभाकर शास्त्री के आदेश एवं सानिध्य में अभिनेता राजपाल यादव ने स्वयं जमीन पर बैठकर पार्थिव शिवलिंग का निर्माण कर विधिवत पूजन-अर्चन किया। साथ ही वे श्रीमद् भागवत कथा के शुभारम्भ कार्यक्रम में भी शामिल हुए। इस दौरान वे भक्ति गीतों पर भाव-विभोर होकर झूमते नजर आए।

माघ मेले में उमड़ी विशाल श्रद्धालुओं की भीड़ को देखकर अभिनेता राजपाल यादव ने कहा, “यह केवल आस्था नहीं, बल्कि श्रद्धा की पराकाष्ठा है। जब भी जियो, पूरे समर्पण और पराकाष्ठा के साथ जियो।” उन्होंने आगे कहा कि वे अभिनेता जरूर हैं, लेकिन उनका जीवन समाज और देश की सेवा के लिए समर्पित है। “अभिनेता का दूसरा नाम सेवा है। मेरी कोशिश रहती है कि जहां भी जाऊं, गहना बनकर मिलूं, गहना बनकर सुनूं और अवसर मिले तो माथे का तिलक बनकर जियूं।”

फिल्मों को लेकर बातचीत में राजपाल यादव ने कहा कि कोरोना लॉकडाउन के बाद वर्ष 2022 से बॉलीवुड ने नई गति पकड़ी है और आने वाले 10 से 15 वर्ष फिल्म उद्योग के लिए स्वर्णिम काल साबित होंगे। उन्होंने बताया कि अब भारत में 2 हजार से 4 हजार करोड़ रुपये तक के बजट की फिल्में बन रही हैं, जिन्हें तकनीक की मदद से 72 भाषाओं में पूरी दुनिया तक पहुंचाया जा सकता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा, “आज एआई का युग है। अगर इसे मिशन की तरह अपनाया जाए तो यह औषधि बनेगा, लेकिन अगर इसके साथ खिलवाड़ किया गया तो परिणाम गंभीर होंगे। जैसा बोएंगे, वैसा ही पाएंगे-बबूल बोएंगे तो बबूल और आम बोएंगे तो आम मिलेगा।”

मीडिया प्रभारी सनी केशरी ने जानकारी देते हुए बताया कि माघ मेले के अंतर्गत आयोजित यह आयोजन श्रद्धा, संस्कृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम है, जिसमें देश-विदेश से श्रद्धालु और गणमान्य लोग सहभागिता कर रहे हैं। ऐसे आयोजनों से न केवल भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार होता है, बल्कि समाज में सकारात्मक ऊर्जा और सद्भाव का संदेश भी जाता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र