भारतीय दर्शन से ही प्रशस्त होगा सांस्कृतिक पुनर्जागरण : घनश्याम शाही
--अभाविप इविवि इकाई ने ‘भारतीय ज्ञान परम्परा और विद्यार्थियों में आत्मनिर्भरता का विकास’ संगोष्ठी का किया आयोजन
प्रयागराज, 31 मार्च (हि.स)। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप), इलाहाबाद विश्वविद्यालय इकाई द्वारा मंगलवार को केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के गंगानाथ झा में ‘भारतीय ज्ञान परम्परा और विद्यार्थियों में आत्मनिर्भरता का विकास’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
मुख्य वक्ता अभाविप, पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्रीय संगठन मंत्री घनश्याम शाही ने विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि, ‘भारतीय संस्कृति ‘नित नूतन, चिर पुरातन’ है। हमारी परम्परा ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की है, जिसमें सम्पूर्ण धरा को अपना परिवार माना गया है। हमारी ज्ञान परम्परा केवल किताबी नहीं, बल्कि व्यावहारिक है। भारत का दर्शन प्रत्येक व्यक्ति को विशिष्ट मानते हुए स्व-बोध की बात करता है। जब तक विद्यार्थी अपनी जड़ों को समझकर ज्ञान-विज्ञान से नहीं जुड़ेंगे, तब तक वास्तविक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य प्राप्त करना कठिन है। आज जिस सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है, उसका मार्ग उन्नत भारतीय दर्शन से ही प्रशस्त होगा।’
अध्यक्षता करते हुए केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के निदेशक प्रो. ललित कुमार त्रिपाठी ने कहा कि, ‘संस्कृत और भारतीय ज्ञान परम्परा एक-दूसरे के पूरक हैं। वर्तमान शिक्षा नीति में भी इसी प्राचीन वैभव को आधुनिकता के साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और वैचारिक भी होनी चाहिए, जिसकी कुंजी हमारे उपनिषदों और शास्त्रों में निहित है।’
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य अभिनव मिश्र ने बताया कि अभाविप अपनी स्थापना काल से ही भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु प्रयासरत रही है। इसी क्रम में आयोजित इस संगोष्ठी के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया गया। अभाविप का यह स्पष्ट मत है कि वैश्विक विकास के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए अपनी विशिष्ट संस्कृति और गौरवशाली अतीत का संबल आवश्यक है।
इस दौरान अभाविप, इलाहाबाद विश्वविद्यालय इकाई उपाध्यक्ष सौरभ सिंह, प्रांजल, इकाई मंत्री काव्यांशी कुमारी, अर्पित त्रिपाठी, अनन्या, हर्षिता सहित अन्य कार्यकर्ताओं की उपस्थिति रही।
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हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र