357 साल बाद बिछड़े खानदान के लोग हुए एक, जौनपुर में हुआ कुल मिलन
जौनपुर, 03 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के जौनपुर में केराकत कोतवाली क्षेत्र के डेहरी गांव में शनिवार को 357 वर्ष बाद एक खानदान के बिछड़े लोगों का कुल मिलन हुआ। औरंगजेब के शासनकाल में 1669 ई. में अलग हुए परिवार के सदस्य आठ पीढ़ियों बाद एक-दूसरे से मिले। काशी और जौनपुर समेत पूर्वांचल के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे ब्राह्मण परिवार के लोगों ने नौशाद अहमद दूबे को अपने परिवार का बड़ा और मुखिया माना।विशाल भारत संस्थान के प्रदेश अध्यक्ष नौशाद अहमद दूबे ने बिछड़े रिश्तों को जोड़ने के लिए भोजभात का आयोजन किया। कार्यक्रम में पहुंचे रिश्तेदारों का माला पहनाकर स्वागत किया गया। लंबे अंतराल के बाद मिले परिजनों की आंखों में खुशी और भावुकता का माहौल रहा।बताया गया कि नौशाद अहमद दूबे के आठ पीढ़ी पूर्वज लाल बहादुर दूबे आजमगढ़ के रानी की सराय के निवासी थे। औरंगजेब के दौर में परिस्थितियों के कारण उन्होंने इस्लाम ग्रहण किया और जौनपुर के डेहरी गांव में आकर बस गए। उनके परिवार के अन्य सदस्य रानी की सराय समेत पूर्वांचल के विभिन्न क्षेत्रों में चले गए। पीढ़ियों तक दोनों पक्षों के लोग एक-दूसरे से बिछड़े रहे।नौशाद अहमद दूबे की बेटी की शादी के कार्ड पर ‘दूबे’ उपनाम लिखे जाने के बाद पूर्वजों और रिश्तेदारों की तलाश शुरू हुई। विशाल भारत संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं इतिहासकार डॉ. राजीव श्रीगुरुजी और उनकी शोध टीम ने करीब चार वर्षों तक पड़ताल कर पूर्वांचल में बिछड़े रिश्तेदारों की जानकारी जुटाई।जौनपुर के शैलेन्द्र शुक्ला ने बताया कि नौशाद अहमद दूबे उनकी बुआ पक्ष से रिश्तेदार हैं, जबकि वाराणसी के विवेक मिश्रा ने उन्हें ननिहाल पक्ष का मामा बताया।कार्यक्रम में बड़कू हनुमान जी आश्रम के पीठाधीश्वर महंत प्रभु रामदास ने कहा कि खून और खानदान के रिश्ते पूजा पद्धति से अलग नहीं हो सकते। उन्होंने नौशाद अहमद दूबे को परिवार का बड़ा बताते हुए उनके सम्मान की बात कही।इस अवसर पर आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक एवं केंद्रीय अधिकारी विजय शर्मा भी मौजूद रहे। उन्होंने श्रीवत्स गौशाला का उद्घाटन किया। डॉ. राजीव श्रीगुरुजी ने कहा कि अपनी जड़ों से जुड़ने पर बिछड़े रिश्ते फिर जुड़ सकते हैं। संचालन डॉ. अर्चना भारतवंशी ने किया।
हिन्दुस्थान समाचार / विश्व प्रकाश श्रीवास्तव