स्वास्थ्य हेतु भूमि सुपोषण : विकसित भारत का आधार

 


हरिद्वार, 03 अप्रैल (हि.स.)। गुरुकुल कांगड़ी (समविश्वविद्यालय) के वनस्पति एवं सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग में “स्वास्थ्य हेतु भूमि सुपोषण : विकसित भारत का आधार” विषय पर भूमि सुपोषण संगोष्ठी 2026 का शुभारम्भ वेदमंत्रोच्चार, दीप प्रज्ज्वलन एवं भूमि पूजन के साथ किया गया। यह कार्यक्रम दिल्ली फार्मास्यूटिकल साइंसेस एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी तथा अक्षय कृषि परिवार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया।

उद्घाटन सत्र में विभागाध्यक्ष प्रो. मुकेश कुमार ने स्वागत भाषण देते हुए आयोजन का श्रेय विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. प्रतिभा मेहता लूथरा को दिया। उन्होंने कहा कि कुलपति का दूरदर्शी दृष्टिकोण, संस्थान के प्रति उनका समर्पण तथा उत्कृष्ट कार्यशैली ही इस संगोष्ठी की आधारशिला है।

कुलपति प्रो. प्रतिभा मेहता लूथरा ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्र स्तरीय भूमि सुपोषण एवं संरक्षण जन अभियान के अंतर्गत देशभर में भूमि पूजन कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। उन्होंने मृदा स्वास्थ्य सुधार और सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन तथा संरक्षण आधारित उपायों की आवश्यकता पर बल दिया।

संगोष्ठी का प्रमुख आकर्षण कन्या गुरुकुल परिसर, हरिद्वार की छात्राओं द्वारा बनाई गई भव्य रंगोली रही। डॉ. वरिंदर विर्क के निर्देशन में एमएससी सूक्ष्मजीव विज्ञान की छात्राओं ने ‘धरती माता और प्रकृति’ की थीम पर रंगोली बनाकर सभी अतिथियों का ध्यान आकर्षित किया। कार्यक्रम के दौरान डॉ. कल्पना सागर द्वारा दिए गए लाइव सपोर्ट और समन्वय की भी सराहना की गई।

विशिष्ट अतिथि प्रो. रविचंद्रन वी. (कुलपति, डीपीएसआरयू) ने “भूमि सुपोषण से एएमआर नियंत्रण तक : ग्रह के स्वास्थ्य के लिए ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण” विषय पर व्याख्यान देते हुए रोगाणुरोधी प्रतिरोध और मृदा स्वास्थ्य के बीच वैज्ञानिक संबंधों को भविष्य की बड़ी चुनौती बताया। वहीं डॉ. सुरेंद्र सिंह (सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा) ने जलवायु-अनुकूल खेती के लिए बायोइनोकुलेंट्स की उपयोगिता पर प्रकाश डाला।

इस दौरान वक्ताओं ने बताया कि भूमि सुपोषण का अर्थ मिट्टी को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान कर उसकी उर्वरता को पुनर्जीवित करना है। रासायनिक खेती से प्रभावित मिट्टी को बचाने, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और विषमुक्त भोजन उत्पादन के लिए यह अभियान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें गोबर, वर्मीकम्पोस्ट और प्राकृतिक खेती को विशेष महत्व दिया गया।

प्रो. पुरुषोत्तम कौशिक और डॉ. विपिन कुमार ने पारंपरिक भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर बल देते हुए ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य की नींव के रूप में मृदा स्वास्थ्य’ विषय पर अपने विचार रखे। अक्षय कृषि परिवार के राष्ट्रीय सह-संयोजक आलोक कुमार गुप्ता ने इसे विकसित भारत 2047 के लिए आवश्यक जन आंदोलन बताते हुए देश की लगभग 30 प्रतिशत अवनत भूमि को बचाने के लिए व्यापक जनभागीदारी का आह्वान किया। कार्यक्रम में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. सत्यदेव निगमालंकार ने वैदिक साहित्य में मिट्टी के महत्व का उल्लेख करते हुए मृदा उर्वरता बनाए रखने में पशुधन, विशेषकर गायों की भूमिका को रेखांकित किया।

संगोष्ठी में जीवविज्ञान संकाय की डीन प्रो. नमिता जोशी, डॉ. कार्तिकेय गुप्ता, डॉ. हरीश कुमार, डॉ. संदीप कुमार, डॉ. विनीत बिश्नोई, डॉ. चिरंजीब बैनर्जी, जनसंपर्क अधिकारी डॉ. शिव कुमार चौहान, कुलभूषण शर्मा सहित विभाग के छात्र-छात्राएं और शोधार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन एवं अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रो. सत्येंद्र राजपूत द्वारा किया गया।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला