सड़कों पर उतरी पर्वतीय संस्कृति की झलक
हल्द्वानी, 14 जनवरी (हि.स.)। शहर की सड़कों पर उस समय पर्वतीय संस्कृति की जीवंत झलक देखने को मिली, जब पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य, ढोल-दमाऊं और छोलिया नृत्य की गूंज ने पूरे वातावरण को सांस्कृतिक रंगों से भर दिया।
आयोजन के दौरान कुमाऊं और गढ़वाल की समृद्ध लोकपरंपराएं आमजन के सामने जीवंत रूप में प्रस्तुत हुईं कार्यक्रम में महिलाओं ने पिछौड़ा, पुरुषों ने पारंपरिक परिधान धारण कर लोकनृत्य प्रस्तुत किए, वहीं ढोल-दमाऊं की थाप पर युवाओं का उत्साह देखते ही बनता था। छोलिया नृत्य, झोड़ा-चांचरी और लोकगीतों ने दर्शकों को पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ दिया।आयोजन का उद्देश्य नई पीढ़ी को पर्वतीय संस्कृति, लोककला और पारंपरिक मूल्यों से परिचित कराना था।
सांस्कृतिक जुलूस शहर के प्रमुख मार्गों से गुज़रा, जहां बड़ी संख्या में नागरिकों ने रुककर कार्यक्रम का आनंद लिया और कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।स्थानीय सांस्कृतिक संगठनों का कहना है कि ऐसे आयोजन न केवल पहाड़ की पहचान को सहेजने का कार्य करते हैं, बल्कि शहरों में बसे पर्वतीय समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी बनते हैं।
हल्द्वानी की सड़कों पर उतरी यह सांस्कृतिक छटा यह संदेश देती नजर आई कि आधुनिकता के बीच भी पर्वतीय लोकसंस्कृति आज भी जीवंत और प्रासंगिक है।पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच द्वारा आयोजित सात दिवसीय मेले का आज नगर भ्रमण कार्यक्रम भव्य झाकियों के साथ संपन्न हुआ। मंच प्रांगण से शुरू हुई झाकियों ने शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए पर्वतीय समाज की सांस्कृतिक विविधता, लोक परंपराओं और एकता को प्रदर्शित किया। मंच द्वारा आयोजित झाकियों में एक से बढ़कर एक आकर्षक और कलात्मक झांकियों का प्रदर्शन किया गया। प्रत्येक झांकी में पर्वतीय जीवन, लोक संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक संदेशों को दर्शाया गया।
नगर भ्रमण के दौरान हजारों नागरिकों ने झाकियों का आनंद लिया और आयोजन में उत्साहपूर्वक भाग लिया।इस अवसर पर उत्थान मंच के संरक्षक हुकुम सिंह कुंवर और अध्यक्ष खड़क सिंह बगढ़वाल ने यात्रा शुरू होने से पहले आमजन को संबोधित किया। उन्होंने मेले की महत्ता, पर्वतीय संस्कृति के संरक्षण, सामाजिक एकता और लोक कला को बढ़ावा देने के संदेश दिए। उन्होंने लोगों से सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूक रहने और उसे संरक्षित करने की अपील भी की।पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के अध्यक्ष ने बताया कि यह मंच हर वर्ष इस तरह के मेले का आयोजन करता है, जिसका उद्देश्य न केवल पर्वतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करना है, बल्कि युवाओं में लोक कला और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति रुचि जागृत करना भी है। मेला और झाकियों का यह भव्य प्रदर्शन नगरवासियों के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहा। पूरे नगर में उत्सव का माहौल देखा गया और उपस्थित लोगों ने झाकियों की प्रस्तुति की जमकर सराहना की।यह आयोजन पर्वतीय समाज में एकता, सांस्कृतिक चेतना और लोक परंपराओं के संरक्षण का प्रतीक बनकर उभरा, जबकि मंच के पदाधिकारी और स्वयंसेवकों ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हिन्दुस्थान समाचार / अनुपम गुप्ता