वैवाहिक विवाद के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहाड के़ निवासी पति को किया दिल्ली निवासी पत्नी द्वारा लगाये आरोपों से दोषमुक्त
नैनीताल, 17 मार्च (हि.स.)। उत्तराखंड से जुड़े एक वैवाहिक विवाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए आपराधिक अभियोग और घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही को निरस्त कर दिया है। मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक व मानवीय परिस्थितियों को भी उजागर करने वाला रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार 25 जनवरी 2005 को हल्द्वानी में रानीखेत निवासी संदीप पाठक और दिल्ली की निवासी महिला से आपसी सहमति से हिंदू रीति-रिवाजों और प्रथाओं के अनुसार हुआ था। किंतु विवाह के उपरांत महिला दिल्ली में पली-बढ़ी लड़की होने के कारण अपने पति के उत्तराखंड के अल्मोड़ा जनपद के रानीखेत जिला अल्मोड़ा उत्तराखंड स्थित ससुराल में 25 से 30 जनवरी तक मुश्किल से 6 दिनों तक अपनी ससुराल में रही और पति व परिजनों के द्वारा उसे सहज महसूस कराने के लिए किए गए प्रयासों के बावजूद पति को उसे उसके माता-पिता के घर, दिल्ली तक छोड़कर आना पड़ा। जून 2005 के दूसरे सप्ताह में एक सप्ताह के लिए वह बीच-बीच में रानीखेत आई, लेकिन फिर से कहा कि वह उन ग्रामीणों के साथ किसी गाँव में नहीं रहना चाहती और दिल्ली लौटने पर जोर दिया और पति से भी दिल्ली रहने को कहा। पति ने वहाँ जाकर बसने में अपनी असमर्थता व्यक्त की और उससे ही रानीखेत में रुकने का अनुरोध किया। 20 जून को पति संदीप पाठक पत्नी के साथ दिल्ली गया और उसके माता-पिता से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उसका व्यवहार हमेशा से ऐसा ही रहा है। उस रात पत्नी ने पति को धमकी दी कि यदि उसने उसके माता-पिता से उसके आचरण के बारे में शिकायत की तो वह कथित तौर पर आत्महत्या कर लेगी और पति को झूठे मामले में फंसा देगी। इस आचरण से व्यथित होकर पति इस उम्मीद में कि समय के साथ स्थिति सुधर जाएगी, अकेला ही रानीखेत लौट आया। आगे फरवरी 2006 में पत्नी फिर से रानीखेत आई, लेकिन इस बार भी दोनों के बीच रिश्ते तनावपूर्ण बने रहे। दिसंबर 2006 में पति फिर सुलह की कोशिश करते हुए दिल्ली के रोहिणी स्थित पत्नी के घर गया, लेकिन आरोप है कि पत्नी ने उनके साथ गाली-गलौज और दुर्व्यवहार किया। जून 2007 पत्नी रानीखेत आई और मांग की कि पति तुरंत उसके साथ दिल्ली चले। लेकिन पति के मना करने पर आरोपों के अनुसार पति ने पति और उनके परिवार के सदस्यों को झूठे मामलों में फंसाने की धमकी दी, ताकि वे जेल में सड़ते रहें। आखिरी बार पत्नी अक्टूबर 2007 में रानीखेत आई और इसके बाद उसने पति को छोड़ दिया और उन्हें दिल्ली आने से मना कर दिया। इसके बाद दोनों के बीच सुलह के कई प्रयास किए, लेकिन सब व्यर्थ रहे। आखिर लगभग चार साल तक अलग रहने के बाद पति ने जुलाई 2011 में वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश अल्मोड़ा उत्तराखंड के समक्ष तलाक याचिका दायर की। जिसके परिणामस्वरूप 2012 में एकतरफा तलाक की डिक्री पारित की गई, जिसे चुनौती नहीं दी गई। इसके बाद, पत्नी ने पति के विरुद्ध दिल्ली में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत एक शिकायत और दहेज उत्पीड़न का मामला दायर किया। विस्तृत सुनवाई के दौरान अब अदालत ने पाया कि शिकायत में लगाए गए आरोप सामान्य, अस्पष्ट थे और उनमें तथ्यात्मक विवरणों की कमी थी। अदालत के अनुसार, भारतीय दंड संहिता की धारा 498। के तहत ‘क्रूरता’ साबित करने के लिए, ठोस और विशिष्ट घटनाओं की आवश्यकता होती है, जो इस मामले में स्पष्ट रूप से नहीं पाई गईं। इसी तरह, दहेज के दुरुपयोग के आरोपों में भी जरूरी तथ्यों और सबूतों की कमी थी। अदालत ने इस बात को भी अहम माना कि तलाक का फैसला पहले ही आ चुका था और वैवाहिक रिश्ता खत्म हो चुका था। इसके बाद दायर की गई घरेलू हिंसा की शिकायत में जरूरी ‘घरेलू रिश्ते’ का आधार नहीं था। इस स्थिति में, अदालत ने ऐसी कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना। मानवीय नजरिए से, यह मामला पहाड़ों और महानगरों के बीच जीवन स्तर में अंतर, वैवाहिक उम्मीदों में असंतुलन, और बातचीत की कमी से पैदा होने वाले टकरावों को भी उजागर करता है। अदालत ने संकेत दिया कि वैवाहिक विवादों को आपराधिक मामला बनाने से पहले तथ्यों की गंभीरता और प्रामाणिकता जरूरी है। आखिरकार दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की अदालत ने 2013 के मामले और घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही को खारिज कर दिया, और याचिकाकर्ता को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. नवीन चन्द्र जोशी