वरिष्ठ रंगकर्मी अविनंदा, मुकेश व गजेन्द्र को रंगायन सम्मान

 


देहरादून, 21 जुलाई (हि.स.)। उत्तराखंड की प्रमुख सांस्कृतिक व सामाजिक संस्था रंगायन एसोसिएशन के दो दिवसीय रंगोत्सव आईआरडीटी सभागार में नाटक अजब गजब की पाठशाला का मंचन व प्रदेश के प्रमुख रंगकर्मियों के सम्मान कार्यक्रम के साथ मंगलवार काे समापन हो गया। रंगोत्सव के दूसरे दिन मुख्य अतिथि उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारंभ किया।

अजब गजब पाठशाला में गायन, नृत्य, व्यंग्य और मनोरंजन के साथ-साथ बच्चों के लिए एक प्रेरणादायक संदेश भी दिया गया। नाटक के अंत में पाठशाला के गुरुजी बच्चों को सीख देते हैं कि यदि वे अच्छे मार्ग पर चलेंगे और अच्छे काम करेंगे तो उनके परिणाम भी अच्छे होंगे, वहीं बुरे रास्ते और बुरे कामों का परिणाम हमेशा बुरा ही होता है।

नाटक में भाग लेने वाले कलाकारों में नवनीत गैरोला, विकास रावत, आदित्य गुप्ता,सुषमा बर्थवाल,अमित बौखण्डी,कुणाल पवार,प्रत्यूष कौशल,अमित सेमवाल, धनंजय कुकरेती और अन्य कलाकार शामिल रहे। नाटक में संगीत निर्देशन विकास रावत और गीत गाय प्रिया उनियाल व राहुल सिंह शाह ने किया।सभी कलाकारों के अभिनय को दर्शकों ने खूब सराहा। अजब-गजब की पाठशाला नाटक का निर्देशन व रूपांतरण रंगायन एसोसिएशन की निदेशक निवेदिता बौंठियाल ने किया। नाटक में देहरादून के 32 कलाकारों ने अपनी प्रतिभा का प्रभावशाली प्रदर्शन किया।

नाटक की समाप्ति के पश्चात रंगायन एसोसिएशन ने प्रदेश के वरिष्ठ रंगकर्मी अविनंदा, मुकेश धस्माना व गजेन्द्र वर्मा को 'रंगायन सम्मान' दे कर उनके रंग मंच व कला के लिए समर्पण व अमूल्य योगदान के लिए शाल पहना कर सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि अस्सी और नब्बे के दशक में देहरादून सांस्कृतिक व रंगमंच की गतिविधियों का केंद्र था और बहुत सारे सांस्कृतिक संगठन और ग्रुप लगातार रंगमंच को सजाते रहते थे। उन्होंने कहा कि एक दौर तो ऐसा भी आया जब देहरादून के रंगमंच प्रेमी टिकट खरीद कर नाटक देखने जाते थे। उन्होंने कहा कि शहर में कभी रेंजर्स कॉलेज ग्राउंड में तो कभी एमकेपी कालेज ग्राउंड में राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलन और मुशायरे आयोजित होते थे और श्रोताओं को बैठने की जगह पाने के लिए कार्यक्रम में समय से पहले पहुंचना पड़ता था।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ विनोद पोखरियाल