बर्फबारी न होने से पर्यटन व खेती के नुकसान के साथ बढ़ा हिमस्खलन का खतरा
ज्योतिर्मठ, 09 जनवरी (हि.स.)। दिसंबर महीना बीत गया जनवरी भी आ गई लेकिन बर्फ नहीं आई, समय पर बर्फबारी नहीं होने का असर केवल पर्यटन व्यवसायियों पर ही नहीं अपितु खेती किसानी पर भी इसका गहरा असर पड़ा है, और इन सबसे ज्यादा आशंका हैंगिग ग्ल्येशियर टूटने व एवलांच का खतरा भी हो सकता है, ऐसा फरवरी 2021 से पूर्व भी देखा गया था तब दिसंबर 2020 एवं जनवरी 2021 मे न्यूनतम बर्फबारी हुई थी और हैंगिग ग्ल्येशियर खिसकने से ऋषि गंगा मे भारी तबाही हुई थी।
इस बार तो देखा गया कि बर्फबारी को लेकर मौसम विभाग का पूर्वानुमान में कुछ सटीक नहीं रहा, दिसंबर- जनवरी महीने मे ही अब तक कई बार मौसम विभाग ने ऊंचाई वाले क्षेत्रों मे हिमपात का पूर्वानुमान जारी किया, खबर देख सुन पर्यटक पहाड़ों की ओर उमड़े भी लेकिन बर्फ का दीदार न कर पाने से मायूस भी दिखे, हालांकि ट्रैकिंग के शौकीन पर्यटकों ने विभिन्न ट्रैकिंग रुट्स पर पहुंचकर नए साल का जश्न मनाया।
बहरहाल समय पर बर्फबारी नहीं होने से पर्यटन व्यवसाय पर जो असर पड़ा सो पड़ा परन्तु इससे खेती किसानी को भी नुकसान ही हुआ है, सेब के पेड़ो को लगाने का सबसे उपयुक्त समय दिसंबर-जनवरी ही होता है, लेकिन बर्फबारी न होने के कारण काश्तकार यह नहीं कर सके लेकिन इन सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि कम बर्फबारी का होना और समय समय पर नहीं होना क्या यह एवलांच का खतरा बन सकता है, यदि फरवरी 2021की ही बात करें तो उस वर्ष भी बर्फबारी भी बेहद कम हुई थी और ऋषि गंगा के ऊपर हैंगिग ग्ल्येशियर टूटने से रैणी से लेकर तपोवन तक भारी तबाही हुई थी, तब के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2020 मे साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित औली मे ही 12दिसंबर 2020को मात्र 5सेमी बर्फ गिरी थी और जनवरी 2021मे मात्र 6सेमी बर्फ गिरी थी।
ग्ल्येशियर वैज्ञानिक डा डीपी डोभाल बताते हैं कि ग्लोवल वार्मिंग के कारण बर्फबारी का सिलसिला सिफ्ट हो रहा है और यह पिछले कई वर्षो से देखा जा रहा है, उन्होंने कहा कि स्थिर ग्ल्येशियर से ज्यादा हैगिंग ग्ल्येशियर खतरनाक होते हैं, ये बेहद सेंसटिव होते हैं, जल्दी बनते हैं और जल्दी खत्म भी होते हैं। देर से बर्फबारी होने पर हैंगिग ग्ल्येशियर के क्रेक होने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है ।
हिन्दुस्थान समाचार / प्रकाश कपरुवाण