पारंपरिक खेती से ही बचेगी पहाड़ की पहचान : पोरी
पौड़ी गढ़वाल, 17 जून (हि.स.)। पलायन, बंजर होते खेत और घटती कृषि गतिविधियों की चुनौती के बीच कृषि विभाग पौड़ी ने विकास भवन सभागार में खेत बचाओ अभियान के तहत किसान गोष्ठी का आयोजन किया। कार्यक्रम में किसानों को पारंपरिक खेती को अपनाकर कृषि भूमि को बचाने और स्थानीय फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया गया।
मुख्य अतिथि विधायक राजकुमार पोरी ने कहा कि उत्तराखंड के खेत केवल अन्न उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और गांवों की आत्मा हैं। यदि खेत खाली होते गए तो गांवों की पहचान भी खतरे में पड़ जाएगी। उन्होंने किसानों से पारंपरिक कृषि पद्धतियों को आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़कर खेती को लाभकारी बनाने का आह्वान किया।
गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, भरसार के विशेषज्ञों ने किसानों को मंडुवा, झंगोरा, चौलाई, राजमा सहित स्थानीय फसलों के महत्व की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पारंपरिक खेती कम लागत, बेहतर पोषण और पर्यावरण संरक्षण का मजबूत आधार है। साथ ही जैविक खेती, फसल विविधीकरण, जल संरक्षण और आधुनिक कृषि तकनीकों के माध्यम से आय बढ़ाने के उपाय भी बताए।
विशेषज्ञों ने कहा कि पहाड़ के खाली होते खेतों को फिर से आबाद करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसके लिए किसानों, युवाओं और कृषि विभाग को मिलकर प्रयास करने होंगे। गोष्ठी में किसानों की समस्याओं पर चर्चा करते हुए कृषि योजनाओं की जानकारी भी दी गई।
इस अवसर पर कृषि विभाग के अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में किसानों ने सहभागिता की। कार्यक्रम में हर खेत हरा-भरा रहे, कोई खेत बंजर न पड़े के संकल्प के साथ पारंपरिक खेती को जनआंदोलन बनाने का आह्वान किया गया।
हिन्दुस्थान समाचार / कर्ण सिंह