धान के खेतों में बची उम्मीद समेट रहे पहाड़ के किसान

 


गोपेश्वर, 12 सितम्बर (हि.स.)। पहाड़ों में बारिश के बीच पिछले कुछ दिनों से निकली धूप किसानों के लिए राहत बनकर आई है। गांवों में इन दिनों सुबह होते ही खेतों की ओर जाती ग्रामीणों की टोलियां नजर आ रही हैं। कहीं खेत में धान की कटाई हो रही है तो कहीं मंडाई का काम चल रहा है। महीनों की मेहनत से तैयार हुई फसल को समेटने में किसान दिनभर जुटे हैं।

वैसे इस बार धान की फसल किसानों के लिए पूरी खुशी लेकर नहीं आई। कई गांवों में जंगली सूअरों ने खेतों में खड़ी धान की फसल को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया। रात के अंधेरे में झुंड के झुंड खेतों में पहुंचे और मेहनत से तैयार फसल को रौंद डाला। कई खेतों में धान की बालियां टूटकर जमीन पर बिखर गईं तो कहीं पूरी फसल ही चैपट हो गई। किसानों के सामने अब जो बचा है, उसे सुरक्षित घर तक पहुंचाने की चुनौती है। बारिश के बीच खेतों में नमी और फसल के गिरने का खतरा बना हुआ है। ऐसे में जैसे ही दिन में धूप खिल रही है, किसान बिना वक्त गंवाए खेतों में पहुंच रहे हैं और धान की मंडाई में जुट जा रहे हैं।

गांवों में इन दिनों मंडाई की आवाजों के बीच किसानों की थकान भी साफ दिखाई देती है। कोई पैरों से धान की मंडाई कर रहा है तो कहीं ग्रामीण पारंपरिक तरीके से फसल निकालने में जुटे हैं। महिलाएं और बुजुर्ग भी परिवार के साथ खेतों में हाथ बंटा रहे हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर कोई बची हुई फसल को समेटने में लगा है। एक किसान के लिए धान सिर्फ खेत में उगने वाला अनाज नहीं, बल्कि पूरे साल की उम्मीद होता है। बीज बोने से लेकर खेत तैयार करने, रोपाई, निराई-गुड़ाई और फिर फसल पकने तक परिवार की महीनों की मेहनत इसमें लगी रहती है। ऐसे में जब जंगली जानवर इस मेहनत को उजाड़ देते हैं तो किसान के पास नुकसान का दर्द सहने के अलावा कई बार कोई रास्ता नहीं बचता।

फिर भी पहाड़ का किसान हार नहीं मान रहा। खेत में जितना धान बचा है, वही अब उसकी उम्मीद है। इसी उम्मीद को समेटने के लिए वह धूप की हर किरण का इस्तेमाल कर रहा है। बारिश थमते ही खेतों में उतरना और फसल को सुरक्षित घर तक पहुंचाना उसकी प्राथमिकता बन गई है। पहाड़ के गांवों में इन दिनों यही तस्वीर है, एक ओर जंगली सूअरों से उजड़ी फसल का दर्द, दूसरी ओर बची हुई बालियों को समेटकर सालभर के अनाज की उम्मीद। किसान की हथेलियों पर लगी मिट्टी और माथे पर छलकता पसीना बता रहा है कि फसल चाहे जितनी कम बची हो, मेहनत और उम्मीद अभी बाकी है।

हिन्दुस्थान समाचार / जगदीश पोखरियाल