तीर्थाटन और पर्यटनः उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़

 

गोपेश्वर, 21 जुलाई (हि.स.)। उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में बीते कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कभी कृषि और पलायन की समस्याओं से जूझने वाला यह पर्वतीय राज्य आज तेजी से तीर्थाटन और पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। चारधाम यात्रा, हेमकुंड साहिब, एडवेंचर टूरिज्म और प्राकृतिक पर्यटन ने लाखों लोगों की आजीविका का नया आधार तैयार किया है।

उत्तराखंड में स्थित बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री सनातन धर्म के प्रमुख तीर्थ हैं, वहीं हेमकुंड साहिब सिख समुदाय की सर्वोच्च आस्था का केंद्र है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं के आगमन से स्थानीय व्यापार, होटल, होमस्टे, परिवहन, घोड़ा-खच्चर, पोर्टर, हस्तशिल्प और छोटे कारोबारों को सीधा लाभ मिलता है। इससे हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है।

धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ उत्तराखंड प्राकृतिक पर्यटन का भी बड़ा केंद्र बन चुका है। नैनीताल, मसूरी, औली, फूलों की घाटी, चोपता, मुनस्यारी और ऋषिकेश जैसे पर्यटन स्थलों पर सालभर पर्यटकों की आवाजाही बनी रहती है। ऋषिकेश में रिवर राफ्टिंग, पर्वतारोहण, ट्रेकिंग और कैंपिंग जैसी साहसिक गतिविधियों ने पर्यटन उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।

जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्वी राज्यों में समय-समय पर उत्पन्न सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों के कारण भी बड़ी संख्या में पर्यटकों ने उत्तराखंड और हिमाचल का रुख किया। इसका सीधा लाभ उत्तराखंड के पर्यटन व्यवसाय को मिला और राज्य देश के सबसे पसंदीदा पर्यटन स्थलों में शामिल हो गया।

चारधाम यात्रा में प्रतिवर्ष 55 से 60 लाख श्रद्धालु पहुंच रहे हैं, जबकि हेमकुंड साहिब में भी हर साल लगभग दो से ढाई लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। बेहतर सड़क नेटवर्क, ऑल वेदर रोड परियोजनाओं और परिवहन सुविधाओं के विस्तार ने तीर्थाटन और पर्यटन दोनों को नई गति दी है।

पर्यटन के बढ़ते दायरे ने युवाओं की सोच भी बदली है। पहले जहां रोजगार के लिए बड़ी संख्या में युवा महानगरों की ओर पलायन करते थे, वहीं अब अनेक युवा अपने गांवों में होमस्टे, होटल, ट्रैवल एजेंसी, एडवेंचर टूरिज्म, स्थानीय उत्पादों के विपणन और गाइड सेवाओं से जुड़कर स्वरोजगार अपना रहे हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ पलायन पर भी कुछ हद तक अंकुश लगा है।

हालांकि इस तेजी से बढ़ते पर्यटन के साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पर्यावरण संरक्षण, कचरा प्रबंधन, यातायात व्यवस्था, जल संसाधनों का संरक्षण और पर्यटन स्थलों पर आधारभूत सुविधाओं का विस्तार समय की आवश्यकता है। यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखा जाए, तो उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था आने वाले वर्षों में और अधिक मजबूत हो सकती है।

आज तीर्थाटन और पर्यटन केवल धार्मिक या मनोरंजन गतिविधि नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ बन चुके हैं। सरकार, स्थानीय समुदाय और पर्यटन उद्योग यदि मिलकर सतत विकास की दिशा में कार्य करें, तो देवभूमि की यह ताकत आने वाले समय में प्रदेश की समृद्धि का सबसे बड़ा आधार सिद्ध होगी।

हिन्दुस्थान समाचार / जगदीश पोखरियाल