उत्तराखंडी पशु परजीवियों से संक्रमित, वृद्धि और दुग्ध उत्पादन प्रभावित
पंतनगर, 15 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तराखंड के तराई और पर्वतीय क्षेत्रों में जुगाली करने वाले अधिकतर दुधारू पशु पेट, लीवर और आंत्र परजीवियों से संक्रमित हैं। इस बात का खुलासा पंतनगर विवि के पशु वैज्ञानिकों के सभी 13 जिलों में पशुओं पर 10 वर्षों तक किए गए अध्ययनों से हुआ है। वैज्ञानिकों ने बीमारी का पता लगाकर पशुओं को इन परिजीवियों से मुक्ति दिलाने का शत-प्रतिशत उपचार भी सुझाया है।
जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय स्थित पशु चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय के पशु परजीवी विज्ञान की विभागाध्यक्ष डाॅ. स्तुति वत्स्या और सहप्राध्यापक डाॅ. राजीव रंजन कुमार का कहना है कि उत्तराखंड में तराई और पर्वतीय क्षेत्रो में पशु परजीवियों से साल भर ग्रसित रहते हैं।
जिससे उनकी प्रजनन, दुग्ध उत्पादन सहित वृद्धि दर आदि बहुत कम है। उन्होंने आईसीएआर की परियोजना के तहत सभी 13 जिलों में दुधारू पशुओं पर 10 वर्षों तक अध्ययन किया गया। सामने आया कि तराई और पर्वतीय क्षेत्रों में जुगाली करने वाले अधिकतर पशुओं के पेट, लीवर और आंतें —आंत्र गोल कृमि (स्ट्रोंगाइलोसिस), एसकेरियोसिस और पत्ता कृमि (फेसियोला, एंफीस्टोम व डाइक्रोसिलियम) नामक परजीवियों से संक्रमित हैं।
डाॅ. राजीव रंजन ने बताया कि स्ट्रोंगाइलोसिस के लिए फेनवेंडाजोल 10 मिग्रा., लेवामिजोल 7.5 मिग्रा. और टेट्रामिजोल हाइड्रोक्लोराइड 15 मिग्रा. नामक कृमिनाशक प्रति किग्रा. पशु को शारीरिक भार के हिसाब से गुड़, चोकर, आटे में मिलाकर खिलाएं। इसके अलावा आइवरमेक्टिन 0.2 मिग्रा प्रतिकिग्रा या एक मिली. लीटर प्रति 50 किग्रा शारीरिक भार के हिसाब से अंतःवचीय मार्ग से दें। वहीं पत्ताकृमि के लिए ट्राइक्लाबेंडाजोल 12.5 मिग्रा (भैंस) व 24 मिग्रा, क्लोजांटल व ऑक्सीक्लोनाजाइड 10 मिग्रा और रेफ्कोसानाइड 7.5 मिग्रा प्रतिकिग्रा शारीरिक भार के हिसाब से गुड़, चोकर, आटे में मिलाकर खिलाएं। फीताकृमि के लिए फेनबेंडाजोल 10 मिग्रा और एलबेंडाजोल 7.5 मिग्रा प्रतिकिग्रा शारीरिक भार के हिसाब से गुड़, चोकर, आटे में मिलाकर खिलाएं। वहीं एस्केरिओसिस में फेनबेंडाजोल 10 मिग्रा प्रतिकिग्रा शारीरिक भार के हिसाब से गुड़, चोकर, आटे में मिलाकर खिलाएं।
कृमिनाशक औषधि का उपयोग करने से पहले पशुओं को कोई भी लीवर टाॅनिक तीन से पांच दिन तक देना चाहिए।
कब खिलाएं: तराई में औषधियां
जुगाली वाले छोटे पशु — स्ट्रोंगाइलोसिस से ग्रसित होने पर अप्रैल/मई व जुलाई /अगस्त, पत्ताकृमि से ग्रसित होने पर नवंबर/दिसंबर, मई एवं जुलाई/अगस्त, इसके अलावा फीताकृमि से ग्रसित होने पर अक्टूबर/नवंबर
जुगाली वाले बड़े पशु— स्ट्रोंगाइलोसिस रोग से ग्रसित होने पर मई/जून व सितंबर/अक्टूबर, पत्ताकृमि से ग्रसित होने पर नवंबर/दिसंबर, मई वंजुलाई/अगस्त, इसके अलावा फीताकृमि से ग्रसित होने पर अक्टूबर/नवंबर में दवा दें। वहीं दाेनाें काे एस्केरिओसिस रोग से बचाने के लिए जन्म के बाद पहली खुराक 7-15 दिन के बीच, दूसरी खुराक एक माह के अंतराल पर तीन माह तक और तीसरी खुराक तीन माह के अंतराल पर एक साल तक।
पर्वतीय क्षेत्रों में औषधियां कब खिलाएं
जुगाली करने वाले छोटे पशुओं को — स्ट्रोंगाइलोसिस रोग से ग्रसित होने पर अप्रैल/मई एवं जुलाई /अगस्त, पत्ताकृमि से ग्रसित होने पर दिसंबर/जनवरी व जुलाई/अगस्त, इसके अलावा फीताकृमि से ग्रसित होने पर अक्टूबर/नवंबर
जबकि जुगाली करने वाले बड़े पशुओं को— स्ट्रोंगाइलोसिस रोग से ग्रसित होने पर मई/जून एवं सितंबर/अक्टूबर, पत्ताकृमि से ग्रसित होने पर दिसंबर/जनवरी, मई/जुन, सितंबर/अक्टूबर, इसके अलावा फीताकृमि से ग्रसित होने पर अक्टूबर/नवंबर में दवा दें।
वहीं एस्केरिओसिस रोग से बचाने के लिए एस्केरिओसिस- जन्म के बाद् पहली खुराक 7-15 दिन के बीच, दूसरी खुराक एक माह के अंतराल पर तीन माह तक और तीसरी खुराक तीन माह के अंतराल पर एक साल तक।
हिन्दुस्थान समाचार / डी तिवारी