सरकारी जमीनों की मनमानी बिक्री नहीं, निवेश और रोजगार बढ़ाना उद्देश्य: प्रमुख सचिव

 


देहरादून, 04 नवंबर (हि.स.)। उत्तराखंड में सरकारी भूमि के उपयोग को लेकर उठ रहे सवालों के बीच प्रमुख सचिव आर. मीनाक्षी सुंदरम ने बुधवार को स्पष्ट किया कि सरकार का उद्देश्य सरकारी जमीनों की मनमानी बिक्री करना नहीं बल्कि उनका उपयोग निवेश आकर्षित करने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और राज्य का राजस्व बढ़ाने के लिए करना है। उन्होंने कहा कि अगले दो से तीन महीने में केवल छह से सात चयनित भूमि खंडों की नीलामी प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी है।

उत्तराखंड निवेश एवं अवसंरचना विकास बोर्ड (यूआईआईडीबी) के माध्यम से संपत्तियों के उपयोग और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत प्रस्तावित योजनाओं पर स्थिति स्पष्ट करते हुए सुंदरम ने कहा कि राज्य की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए उपलब्ध सरकारी भूमि का योजनाबद्ध तरीके से उपयोग करने की पहल की जा रही है। इसके तहत पर्यटन, होटल और अन्य आर्थिक गतिविधियों में निवेश की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।

उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया को लेकर कई ऐसी जमीनों का भी उल्लेख किया जा रहा है, जिनका मौजूदा प्रस्तावों से कोई संबंध नहीं है। सरकार ने सीमित संख्या में भूमि खंड चिह्नित किए हैं और आगामी दो से तीन महीने में इनमें से छह से सात भूमि खंडों की नीलामी प्रक्रिया आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखा है।

प्रमुख सचिव ने कहा कि विशेष रूप से होटल और पर्यटन क्षेत्र में निवेश की व्यापक संभावनाएं हैं। इससे करीब सात से आठ हजार लोगों को प्रत्यक्ष और 10 से 15 हजार लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने का अनुमान है। इसके अलावा वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) तथा अन्य माध्यमों से राज्य को प्रतिमाह करीब 300 करोड़ रुपये का राजस्व मिलने की संभावना है।

सुंदरम ने चौबटिया और धनोल्टी की जमीनों को लेकर उठ रही चर्चाओं पर कहा कि चौबटिया की भूमि की व्यवहार्यता का परीक्षण किया गया था लेकिन उपयुक्त संभावनाएं नहीं मिलने के कारण उसे प्रस्ताव से हटा दिया गया। इसी तरह धनोल्टी की संबंधित भूमि वन भूमि होने के कारण उसे भी प्रस्ताव से बाहर कर दिया गया है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि एचएमटी की जमीन सिडकुल के पास है और वह अपनी योजनाओं के अनुसार उस पर काम कर रहा है। इसका यूआईआईडीबी की मौजूदा प्रक्रिया से कोई संबंध नहीं है। ऋषिकेश स्थित आईडीपीएल की भूमि वन भूमि है और अभी तक राज्य सरकार के किसी विभाग को हस्तांतरित नहीं हुई है इसलिए उसे भी मौजूदा प्रस्ताव से जोड़ना सही नहीं है।

प्रमुख सचिव ने लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृहों को लेकर हो रही चर्चाओं पर कहा कि इनमें से कई संपत्तियों के संबंध में न तो मंत्रिमंडल की स्वीकृति मिली है और न ही यूआईआईडीबी बोर्ड ने कोई अनुमोदन किया है। उन्होंने कहा कि किसी भी भूमि या संपत्ति के संबंध में निर्णय निर्धारित प्रक्रिया और सक्षम स्तर से मंजूरी मिलने के बाद ही आगे बढ़ाया जाता है।

उन्होंने कहा कि इस पहल का एक प्रमुख उद्देश्य प्रदेश के युवाओं को उनके गृह राज्य में रोजगार उपलब्ध कराना है। उत्तराखंड के अनेक युवा होटल प्रबंधन और आतिथ्य सत्कार से जुड़े पाठ्यक्रमों का प्रशिक्षण लेने के बाद रोजगार के लिए दूसरे राज्यों और विदेशों का रुख करते हैं। राज्य में इस क्षेत्र में निवेश बढ़ने से प्रशिक्षित युवाओं को स्थानीय स्तर पर अवसर मिल सकेंगे।

सुंदरम ने कहा कि पर्यटन और होटल क्षेत्र में निवेश का लाभ केवल होटल एवं रिसॉर्ट तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि स्थानीय किसानों, फल एवं सब्जी उत्पादकों, टैक्सी संचालकों, परिवहन व्यवसायियों, हस्तशिल्प कारीगरों, दुकानदारों, होमस्टे संचालकों और अन्य सेवा प्रदाताओं को भी मिलेगा।

उन्होंने कहा कि आर्थिक गतिविधियों के विस्तार से राज्य को मिलने वाले राजस्व का उपयोग सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य आधारभूत सुविधाओं के विकास में किया जा सकेगा। सरकार का प्रयास उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग कर प्रदेश की आर्थिक क्षमता बढ़ाना है।

प्रमुख सचिव ने कहा कि यूआईआईडीबी से संबंधित प्रस्तावों पर चर्चा वास्तविक तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए। जिन जमीनों को प्रस्ताव से हटाया जा चुका है या जिनका मौजूदा प्रक्रिया से कोई संबंध नहीं है, उन्हें योजना का हिस्सा बताने से भ्रम की स्थिति पैदा होती है। सरकार का उद्देश्य राज्य के संसाधनों का उपयोग प्रदेश के युवाओं, नागरिकों और समग्र विकास के हित में करना है।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय