जेल में बंदियों के हाथों आकार ले रहा पिरुल का हुनर

 




पौड़ी गढ़वाल, 17 सितंबर (हि.स.)। जंगलों में बिखरा पिरुल अब जिला कारागार के बंदियों के लिए हुनर और आत्मनिर्भरता का जरिया बन रहा है। ‘एक जेल, एक उत्पाद’ पहल के तहत बंदियों को पिरुल की पत्तियों से हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करने का प्रशिक्षण दिया गया। 21 दिवसीय प्रशिक्षण पूरा करने के बाद बंदी अब सीखी तकनीक से स्वयं विभिन्न सजावटी और उपयोगी उत्पाद तैयार कर रहे हैं।

जिलाधिकारी स्वाति एस. भदौरिया के निर्देशन में जिला उद्योग केंद्र के माध्यम से आयोजित प्रशिक्षण में बंदियों को पिरुल की पत्तियों के प्रसंस्करण से लेकर उनसे घरेलू सजावट के उत्पाद तैयार करने की विभिन्न तकनीकें सिखाई गईं। प्रशिक्षण के दौरान बंदियों ने पिरुल को उपयोगी आकार देने, उत्पाद तैयार करने और उसे आकर्षक रूप देने का व्यावहारिक प्रशिक्षण लिया।

जिला कारागार अधीक्षक कौशल सिंह ने बताया कि पहल का उद्देश्य बंदियों को जेल में रहते हुए ऐसा कौशल उपलब्ध कराना है, जिसे वे सजा पूरी होने के बाद रोजगार और स्वरोजगार के रूप में अपना सकें। उन्होंने कहा कि हुनर सीखने से बंदियों को समाज की मुख्यधारा में लौटने के बाद आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिलेगा।

उन्होंने बताया कि पहाड़ी क्षेत्रों के जंगलों में बड़ी मात्रा में उपलब्ध पिरुल को अक्सर अनुपयोगी समझा जाता है। अब इसी प्राकृतिक संसाधन से आकर्षक हस्तशिल्प उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इससे स्थानीय संसाधन का बेहतर उपयोग होने के साथ बंदियों को रचनात्मक कार्य से जोड़ने और उनके भविष्य के लिए रोजगार की संभावनाएं तैयार करने में मदद मिल रही है।

पिरुल से उत्पाद बनाने का हुनर बंदियों के लिए महज प्रशिक्षण नहीं, बल्कि सजा पूरी होने के बाद नई शुरुआत का जरिया बनने की उम्मीद है।

हिन्दुस्थान समाचार / कर्ण सिंह