कचरा प्रबंधन में जनभागीदारी जरूरी : डॉ. पराग मधुकर धकाते

 


देहरादून, 09 सितंबर (हि.स.)। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को प्रभावी बनाने के लिए जमीनी स्तर पर जनप्रतिनिधियों और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। वैज्ञानिक एवं डेटा आधारित व्यवस्था को धरातल तक पहुंचाने के साथ-साथ, सामूहिक प्रयासों से ही स्वच्छ और कचरा मुक्त उत्तराखंड का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

यह बात राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने बुधवार को कही। वे सचिवालय स्थित मीडिया सेंटर में प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी), देहरादून द्वारा आयोजित एक पत्रकार वार्ता को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026, लीगेसी वेस्ट और डंपसाइट रेमेडिएशन की प्रगति और कचरा पृथक्करण की व्यवस्था की जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि एक अप्रैल 2026 से प्रभावी नए नियमों में कचरे को चार धाराओं-गीला, सूखा, सैनिटरी और विशेष देखभाल वाला कचरा-में अलग करने पर जोर दिया गया है। बल्क वेस्ट जनरेटर्स की जवाबदेही बढ़ाने के साथ कचरे के संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण और निस्तारण की ऑनलाइन निगरानी, डिजिटल पंजीकरण और रिपोर्टिंग की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के साथ कचरे को संसाधन के रूप में इस्तेमाल कर सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देना है।

डॉ.धकाते के अनुसार, उत्तराखंड के 108 शहरी स्थानीय निकायों के 1,314 वार्डों में 100 प्रतिशत डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण की व्यवस्था है। राज्य में करीब 1,515 वाहन उपलब्ध हैं और अतिरिक्त वाहनों की खरीद प्रक्रिया जारी है। चार-धारा पृथक्करण के लिए नए वाहनों में चार कंपार्टमेंट की व्यवस्था की जा रही है। 1,225 वार्डों में स्रोत पर कचरा पृथक्करण शुरू हो चुका है।

उन्होंने बताया कि राज्य में प्रतिदिन करीब 1,930.85 मीट्रिक टन कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से 1,804.59 मीट्रिक टन यानी 93.46 प्रतिशत कचरे का प्रतिदिन प्रसंस्करण किया जा रहा है। राज्य में 61 लीगेसी वेस्ट और डंपसाइट चिन्हित हैं। इनमें करीब 23.34 लाख मीट्रिक टन पुराने कचरे में से 12.70 लाख मीट्रिक टन यानी 54.41 प्रतिशत का उपचार किया जा चुका है। दिसंबर 2026 तक पुराने कचरे के उपचार और डंपसाइट रेमेडिएशन में तेजी लाने का लक्ष्य रखा गया है।

राज्य में 85 एमआरएफ, 663 नैडेप/कम्पोस्ट पिट और 87 प्लास्टिक कॉम्पैक्टर संचालित हैं। वहीं, 1,058 बल्क वेस्ट जनरेटर्स की पहचान की गई है। कचरा संग्रहण और परिवहन की निगरानी के लिए व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम लागू किया जा रहा है। प्रथम चरण में सभी नगर निगमों को इसके दायरे में लाया जा रहा है।

अपर निदेशक, शहरी विकास प्रवीण कुमार ने कहा कि डंपसाइट रेमेडिएशन के माध्यम से पुराने कचरे का वैज्ञानिक उपचार कर उसे सड़क निर्माण सामग्री, भरान सामग्री, पुनर्चक्रण योग्य वस्तुओं और आरडीएफ जैसे उपयोगी संसाधनों में बदला जा रहा है। इससे वायु एवं भूजल प्रदूषण और डंपसाइट में आग की घटनाओं को कम करने में मदद मिलेगी।

उन्होंने कहा कि मेयर,पार्षदों और अन्य जनप्रतिनिधियों को नागरिकों को स्रोत पर चार स्तरीय कचरा पृथक्करण,प्लास्टिक के जिम्मेदार उपयोग और स्वच्छता नियमों के पालन के लिए प्रेरित करना चाहिए। आरडब्ल्यूए, होटल, रेस्तरां और अन्य बल्क वेस्ट जनरेटर्स के कचरे के उचित प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान जरूरी है।

प्रवीण कुमार ने कहा कि चारधाम और अन्य पर्यटन क्षेत्रों में बढ़ती तीर्थयात्रा एवं पर्यटन गतिविधियों को देखते हुए कचरा संग्रहण,पृथक्करण,परिवहन और वैज्ञानिक प्रसंस्करण के लिए विशेष योजना तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरे के लिए विशेष संग्रहण केंद्र स्थापित किए जाएंगे। होटल और रेस्तरां को निर्धारित मानकों के अनुसार गीले कचरे का विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण करना होगा। उन्होंने कहा कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को प्रभावी बनाने के लिए सरकार,स्थानीय निकायों,जनप्रतिनिधियों,संस्थानों,व्यवसायिक प्रतिष्ठानों और नागरिकों की सामूहिक भागीदारी आवश्यक है। इस मौके पर पीआईबी के सहायक निदेशक संजीव सुंद्रियाल उपस्थित थे।

----

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय