मलयालम कहानियों में दिखी आर्थिक असमानता और मानवीय संवेदनाओं की तस्वीर
हरिद्वार, 06 अक्टूबर (हि.स.)। मलयालम कहानियों में आर्थिक असमानता के साथ भूख, श्रम, रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं के बदलते स्वरूप को प्रभावी ढंग से उकेरा गया है। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की ओर से आयोजित दो दिवसीय व्याख्यानमाला के दूसरे दिन प्रो. सिंधु टीआई ने चुनिंदा मलयालम कहानियों और फिल्म के माध्यम से विद्यार्थियों व शोधार्थियों को सामाजिक सरोकारों से रूबरू कराया।
हिन्दी विभाग में आयोजित कार्यक्रम में ‘प्रकृति की ओर वापसी’ विषय के तहत पी. वल्सला की ‘कण्णामन के भैंसे’ में मनुष्य और प्रकृति के टूटते संबंधों तथा फिल्म ‘द 400 ब्लोज’ में आधुनिक जीवन से पैदा हुए अकेलेपन और विस्थापन के संदर्भों पर चर्चा हुई।
वहीं ‘अर्थ-आधारित संस्कृति में मनुष्य’ विषय के अंतर्गत संतोष एच्चिक्कानम की ‘बिरियानी’ में श्रम और मजदूरी के मूल्य, कारूर की ‘पोतिचोर’ में भूख और मानवीय गरिमा तथा वैकोम मुहम्मद बशीर की ‘जन्मदिनम्’ और ‘ओरु मनुष्यन’ में विपरीत आर्थिक परिस्थितियों के बीच कायम मानवीय संवेदनाओं को रेखांकित किया गया।
प्रो. सिंधु ने कहा कि आर्थिक विषमता केवल व्यक्ति की जीवन-स्थितियों को प्रभावित नहीं करती, बल्कि उसके रिश्तों, व्यवहार और संवेदनाओं पर भी गहरा असर डालती है। साहित्य इन बदलावों और सामाजिक अंतर्विरोधों को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता मानविकी संकाय की डीन प्रो. मुदिता अग्निहोत्री ने की। उन्होंने कहा कि व्याख्यान से विद्यार्थियों और शोधार्थियों को मलयालम साहित्य को सामाजिक संदर्भों में समझने की नई दृष्टि मिली। साहित्यिक रचनाओं में उठाए गए प्रश्नों को समकालीन जीवन से जोड़कर देखने का अवसर भी मिला।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अजित तोमर ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. निशा शर्मा ने किया। इस अवसर पर डॉ. रोशनलाल, शोधार्थी दिव्यांशु, जोगिन्द्र, नवप्रभात, अंजलि, शकुन, आस्था खंतवाल, रिंकू, शोभा सहित स्नातक, स्नातकोत्तर विद्यार्थी और शोधार्थी मौजूद रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला