कांवड़ में बैठाकर 115 वर्षीय दादी को लेकर चले दो श्रवण कुमार
हरिद्वार, 02 अगस्त (हि.स.)। धर्मनगरी हरिद्वार से निकलने वाली विश्वप्रसिद्ध कांवड़ यात्रा में इस बार एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने हजारों श्रद्धालुओं को भावुक कर दिया। संभल (उत्तर प्रदेश) के दो युवकों ने अपनी करीब 115 वर्षीय दादी को कांवड़ में बैठाकर पैदल यात्रा शुरू की। कांवड़ के एक पलड़े में मां गंगा का पवित्र जल और दूसरे पलड़े में उनकी वृद्ध दादी विराजमान थीं।
संभल जनपद के खेतापुर गांव निवासी प्रमोद और सतपाल ने बताया कि उनकी दादी अब उम्र के कारण चलने-फिरने में असमर्थ हैं। ऐसे में उन्होंने संकल्प लिया कि इस बार वे दादी को अपने कंधों पर बैठाकर भगवान भोलेनाथ के दर्शन की यात्रा कराएंगे। उन्होंने बताया कि हमारी दादी की उम्र लगभग 115 वर्ष है। अब वह पैदल नहीं चल सकतीं। इसलिए हमने तय किया कि कांवड़ के एक पलड़े में गंगाजल और दूसरे पलड़े में दादी को बैठाकर पूरी यात्रा पैदल करेंगे। पूरा परिवार भी इस पुण्य कार्य में हमारे साथ है।
यात्रा के दौरान कांवड़ में बैठीं वृद्ध दादी पूरे रास्ते हाथ जोड़कर भगवान शिव का स्मरण करती रहीं। उनके चेहरे पर संतोष और श्रद्धा का भाव साफ दिखाई दे रहा था। रास्ते में गुजरने वाले श्रद्धालु इस अनोखे दृश्य को देखकर रुक गए। कई लोगों ने दोनों युवकों की सेवा भावना को प्रणाम किया, जबकि अनेक श्रद्धालुओं ने इसे आधुनिक समय में श्रवण कुमार की परंपरा का जीवंत उदाहरण बताया। यह दृश्य न केवल कांवड़ यात्रा की आध्यात्मिक गरिमा को दर्शाता है, बल्कि भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों के सम्मान, सेवा और पारिवारिक मूल्यों की उस परंपरा को भी सामने लाता है, जो सनातन संस्कृति की पहचान रही है। श्रद्धालुओं का कहना था कि ऐसी तस्वीरें समाज को यह संदेश देती हैं कि माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। कांवड़ यात्रा के बीच सामने आई यह भावुक तस्वीर हर किसी के मन में एक गहरा संदेश छोड़ गई कि सनातन संस्कृति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और परिवार के प्रति अटूट सम्मान की जीवन शैली है।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला