जलवायु परिवर्तन के दौर में खंडित जल संरक्षण नहीं, एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन जरूरी
देहरादून, 07 सितंबर (हि.स.)। जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव और जलवायु परिवर्तन के कारण सामने आ रही चुनौतियों के बीच अलग-अलग वाटरशेड स्तर पर किए जा रहे प्रयासों के बजाय नदी बेसिन को एक इकाई मानकर जल प्रबंधन की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में आईसीएआर-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (आईसीएआर-आईआईएसडब्ल्यूसी), देहरादून में सोमवार को ‘माइक हाइड्रो बेसिन’ का उपयोग करते हुए एकीकृत जल संसाधन मॉडलिंग एवं बेसिन प्रबंधन विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला शुरू हुई।
कार्यशाला में मुख्य अतिथि डॉ. ए.के. डिमरी, संयुक्त निदेशक, वाटरशेड प्रबंधन, वाटरशेड प्रबंधन निदेशालय, उत्तराखंड ने हाल में सामने आई फ्लैश फ्लड की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण वाटरशेड विकास और प्रबंधन के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने और दीर्घकालिक एवं टिकाऊ परिणाम हासिल करने के लिए वाटरशेड स्तर पर किए जा रहे हस्तक्षेपों को नदी बेसिन स्तर की समग्र योजना से जोड़ना आवश्यक है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. डी.एस. रावत ने जल संसाधनों और नदी प्रणालियों से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए आईसीएआर-आईआईएसडब्ल्यूसी और सारा के बीच संस्थागत सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि नदी पुनर्जीवन को केवल नदी तक सीमित रखकर नहीं देखा जा सकता। इसके लिए नदी और उसके पूरे जलग्रहण क्षेत्र की समग्र समझ विकसित करना जरूरी है। उन्होंने वैज्ञानिक आकलन, क्षेत्रीय स्तर पर प्रभावी हस्तक्षेप और विभिन्न विभागों के बीच समन्वित योजना के माध्यम से नदी पुनर्जीवन के प्रयासों को अधिक प्रभावी और टिकाऊ बनाने पर जोर दिया।
विशेषज्ञों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण अचानक आने वाली बाढ़, जल उपलब्धता में बदलाव और नदी प्रणालियों पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए जल प्रबंधन की पारंपरिक पद्धतियों में बदलाव जरूरी है। वाटरशेड स्तर पर अलग-अलग किए जाने वाले कार्यों को नदी बेसिन की व्यापक योजना से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
आईसीएआर-आईआईएसडब्ल्यूसी के प्रमुख एवं प्रधान वैज्ञानिक और कार्यशाला कार्यक्रम निदेशक डॉ. अंबरीश कुमार ने कहा कि बेसिन से जुड़े आंकड़ों और वैज्ञानिक मॉडलिंग को व्यावहारिक जल प्रबंधन संबंधी निर्णयों में बदलना कार्यशाला का प्रमुख उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव और जलवायु परिवर्तनशीलता को देखते हुए एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ना होगा। उन्होंने उत्तराखंड स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (सारा) के ‘वन डिस्ट्रिक्ट-वन रिवर’ कार्यक्रम के संदर्भ में भी इस दृष्टिकोण की उपयोगिता बताई।
कार्यशाला में ‘माइक हाइड्रो बेसिन’ के माध्यम से बेसिन से जुड़े आंकड़ों को जल प्रबंधन संबंधी निर्णयों में उपयोग करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। विशेषज्ञ प्रतिभागियों को वैज्ञानिक मॉडलिंग, नदी पुनर्जीवन और सतत बेसिन प्रबंधन में आधुनिक तकनीकों के व्यावहारिक उपयोग की जानकारी दे रहे हैं।
आईसीएआर-आईआईएसडब्ल्यूसी के प्रभारी निदेशक डॉ. चरण सिंह ने मृदा एवं जल संरक्षण, वाटरशेड विकास और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में संस्थान के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच), रुड़की के पूर्व प्रमुख एवं वैज्ञानिक-जी डॉ. आर.पी. पांडे ने नदी पुनर्जीवन के क्षेत्र में अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने देहरादून की रिस्पना नदी से जुड़े पुनर्जीवन कार्यों से प्राप्त अनुभवों और सीख की जानकारी प्रतिभागियों को दी।
कार्यशाला का आयोजन आईसीएआर-आईआईएसडब्ल्यूसी, सारा और डीएचआई इंडिया की ओर से संयुक्त रूप से किया जा रहा है। यह ‘बूढ़ी गंडक बेसिन के जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव’ परियोजना के तहत आयोजित हो रही है, जिसे जल शक्ति मंत्रालय के आईएनसीसीसी का सहयोग प्राप्त है। इसके अलावा उत्तराखंड में सारा की ओर से वित्तपोषित कमल गंगा नदी पुनर्जीवन परियोजना से भी यह पहल जुड़ी है।
कार्यशाला में एनआईएच रुड़की, केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई), करनाल और डीएचआई के विशेषज्ञ संसाधन व्यक्तियों के रूप में प्रशिक्षण दे रहे हैं। कार्यक्रम में डॉ. उदय मंडल, डॉ. रमा पाल, डॉ. वेंकटेश और अभियंता एच.एस. भाटिया सहित अन्य विशेषज्ञ और प्रतिभागी मौजूद रहे।
सात और आठ सितंबर को हाइब्रिड माध्यम से आयोजित इस कार्यशाला में देश के 29 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के 98 जिलों से करीब 400 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया है। वैज्ञानिक, शोधकर्ता, विद्यार्थी और विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारी इसमें प्रत्यक्ष और ऑनलाइन माध्यम से हिस्सा ले रहे हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय