बागेश्वर उत्तरायणी मेले में सजा जड़ी-बूटियों का बाजार

 




देहरादून, 16 जनवरी (हि.स.)। बागेश्वर की ऐतिहासिक उत्तरायणी मेले में जड़ी बूटी के उत्पादों का जमकर कारोबार हो रहा है। इन उत्पादों को खरीदने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। वहीं मेले में धारचूला, मुनस्यारी के दारमा, जोहार, व्यास, चौंदास, और बागेश्वर के दानपुर से आए जड़ी बूटी के व्यापारियों के सामानों की जबरदस्त मांग है। ये जड़ी—बूटियां रोजमर्रा के उपयोग के साथ ही बीमारियों में दवा का भी काम करती हैं।

उत्तरायणी मेले में पिथौरागढ़ जिले के धारचूला, मुनस्यारी, जोहार, दारमा, व्यास और चौंदास आदि क्षेत्रों के व्यापारी तिब्बत व्यापार के समय से ही हर साल बागेश्वर की उत्तरायणी में भी व्यापार के लिए आते हैं। हिमालयी जड़ी-बूटी को लेकर आने वाले इन व्यापारियों का हर किसी को बेसब्री से इंतजार रहता है। हिमालय की जड़ी-बूटियां ऐसी दवाइयां हैं जो रोजमर्रा के उपयोग के साथ ही बीमारियों में दवा का भी काम करती हैं।

दारमा के बोन गांव के किशन सिंह बोनाल बताते हैं कि जंबू की तासीर गर्म होती है। इसे दाल में डाला जाता है। गंदरैणी भी बेहतरीन दाल मसाला है, यह पेट, पाचन तंत्र के लिए उपयोगी है। वही कुटकी को बुखार, पीलिया, मधुमेह, न्यूमोनिया में, डोलू को गुम चोट में, मलेठी को खांसी में, अतीस को पेट दर्द में और सालम पंजा कमजोरी में लाभ दायक होता है। उनका कहना है कि अब बाजार बढ़ने के साथ-साथ इसकी मांग भी लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि उत्तरायणी मेला पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को आमजन तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण मंच है।

वहीं बोन गांव से जड़ी-बूटी बेचने पहुंची मनीषा ने बताया कि पहले जहां लोग केवल दवाइयों पर निर्भर रहते थे, अब दोबारा आयुर्वेद और प्राकृतिक उपचारों की ओर रुझान बढ़ा है। उन्होंने बताया कि उनका परिवार करीब 50 सालों से इस मेले में आता है अब वह भी हर साल स्थानीय मेलो में आते है और अपने उत्पादों को बेचते है।

जड़ी-बूटी व्यापारी आशा बोनाल ने बताया कि उत्तरायणी मेला पहाड़ की पारंपरिक औषधीय विरासत को सहेजने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि इस तरह के मेलों से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है और हिमालयी जड़ी-बूटियों को पहचान भी मिलती है। उन्होंने बताया कि विभिन्न जड़ी बेटियों की अलग—अलग कीमत है। इनमें कीड़ा जड़ी 600 रुपये प्रति पीस और याक दूध 2000 रुपये प्रति किलो बिक रहा है।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ विनोद पोखरियाल