पुस्तक ‘नाद नन्दिनी’ का लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन

 


देहरादून, 21 मार्च (हि.स.)। देहरादून में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से लोक संगीत के मर्मज्ञ एवं संस्कृतिविद स्व. केशव अनुरागी की कृति ‘नाद नन्दिनी’ का लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम दून पुस्तकालय के सभागार में संपन्न हुआ, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों और सांस्कृतिक हस्तियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम में पद्मश्री से सम्मानित लोक गायिका डॉ. माधुरी बड़थ्वाल, प्रसिद्ध लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी, वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा, सामाजिक विचारक लोकेश नवानी, चिंतक विनोद रतूड़ी व सामाजिक इतिहासकार डॉ. योगेश धस्माना मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर अनुरागी के पुत्र डॉ. राकेश मोहन एवं दूरदर्शन के सहायक निदेशक अनिल भारती भी मौजूद रहे।

वक्ताओं ने ‘नाद नन्दिनी’ को उत्तराखंड के लोक संगीत अध्ययन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि यह कृति लोक संगीत के व्यवस्थित वर्गीकरण, संगीत संरचनाओं की विस्तृत व्याख्या तथा लोक वाद्ययंत्रों, ताल और लय के गहन विश्लेषण के कारण विशेष महत्व रखती है।

डॉ. माधुरी बड़थ्वाल ने इसे लोक संगीत के इतिहास में मील का पत्थर बताते हुए कहा कि पुस्तक कुमाऊंनी और गढ़वाली परंपराओं को सरल एवं व्यापक रूप में प्रस्तुत करती है। वहीं, नरेन्द्र सिंह नेगी ने अनुरागी को अपना प्रारंभिक गुरु बताते हुए उनके योगदान को स्मरण किया और कहा कि उन्होंने पर्वतीय संगीत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

राजीव नयन बहुगुणा ने कहा कि अनुरागी ने लोक संगीत का वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित विश्लेषण प्रस्तुत किया है, जो शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। डॉ. योगेश धस्माना एवं विनोद रतूड़ी ने भी अनुरागी के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्हें विलक्षण लोक संस्कृति कर्मी बताया।

कार्यक्रम में बताया गया कि ‘नाद नन्दिनी’ का प्रथम प्रकाशन वर्ष 1996 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से हुआ था। पुस्तक में लोक परंपराओं के विविध रूपों—मंगल गीत, जागर, घसियारी गीत, चौफुला, चैती, पांडव गीत एवं ऋतुपरक परंपराओं—का विस्तृत संकलन एवं विश्लेषण किया गया है।

पुस्तक लोक धुनों की लय, संरचना और सांगीतिक गहराई के अध्ययन के साथ-साथ लोक वाद्ययंत्रों की तकनीक, जटिल लयबद्ध संरचनाओं एवं आध्यात्मिक-सांस्कृतिक संदर्भों का भी दस्तावेजीकरण करती है। वक्ताओं ने इसे उत्तराखंड की सांगीतिक विरासत को संरक्षित करने वाला महत्वपूर्ण सांस्कृतिक दस्तावेज बताया।

इस अवसर पर अनुरागी द्वारा संकलित पर्वतीय लोकगीतों की प्रस्तुति भी दी गई। कार्यक्रम का संचालन योगम्बर पोली ने किया, जबकि प्रारंभ में कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में साहित्यकारों, लेखकों, संगीत एवं संस्कृति प्रेमियों सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय