मृदा कटाव और जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए बड़ी चुनौती, वैज्ञानिक संरक्षण पर जोर

 


देहरादून, 07 मई (हि.स.)। जलवायु परिवर्तन, सूखते जल स्रोत और बेमौसमी बारिश कृषि के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। देश में हर वर्ष मृदा कटाव से हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है, इसलिए जल संरक्षण, कार्बन न्यूट्रल कृषि और वैज्ञानिक वाटरशेड प्रबंधन पर अधिक कार्य करने की आवश्यकता है।

गुरुवार को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के देहरादून स्थित कार्यालय में भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान के निदेशक डॉ भगवती प्रसाद भट्ट ने पत्रकारों से बातचीत में यह बातें कही। उन्होंने कहा कि देशभर में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 114 संस्थान कार्यरत हैं और देहरादून का संस्थान राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है।

डॉ भट्ट ने बताया कि संस्थान प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ किसानों, अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रशिक्षण भी प्रदान कर रहा है। उन्होंने कहा कि देश अभी भी तिलहन और दलहन उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है, जबकि दूध, बागवानी और अंडा उत्पादन में अधिशेष स्थिति में पहुंच चुका है। स्वस्थ पोषण सुनिश्चित करने के लिए कृषि उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने पर लगातार कार्य किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जल प्रबंधन, जल उपयोग दक्षता, पोषण सुरक्षा, कृषि मशीनरी और उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को देखते हुए शून्य कार्बन उत्सर्जन और कार्बन न्यूट्रल कृषि की दिशा में प्रयास दोगुने करने होंगे।

उत्तराखंड के संदर्भ में उन्होंने कहा कि राज्य में पारंपरिक जल स्रोत धीरे-धीरे सूख रहे हैं और बेमौसमी बारिश नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। हालांकि वैज्ञानिक प्रबंधन और तकनीकी हस्तक्षेप से इन समस्याओं को नियंत्रित कर कृषि को लाभकारी बनाया जा सकता है, जिससे पलायन की समस्या कम करने में भी मदद मिलेगी।

संस्थान के अनुसार देश में प्रतिवर्ष लगभग 5.11 बिलियन टन मिट्टी का कटाव होता है। इससे अनाज, तिलहन और दलहन उत्पादन में करीब 13.4 मिलियन टन की कमी आती है, जिसकी आर्थिक क्षति लगभग 29,200 करोड़ रुपये आंकी गई है। वहीं मिट्टी के कटाव से हर साल 38,540 करोड़ से 45,410 करोड़ रुपये तक का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है।

संस्थान ने बताया कि जल कटाव के कारण लगभग 115 मिलियन टन ऑर्गेनिक कार्बन विस्थापित होता है, जिससे वातावरण में 34.6 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन होता है। वैज्ञानिक संरक्षण उपायों से इस उत्सर्जन को 19 से 27 मिलियन टन प्रतिवर्ष तक कम किया जा सकता है। संस्थान ने पहाड़ी नालों, भूस्खलन क्षेत्रों, खदान मलबे, पथरीली और ढालू भूमि सुधार, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता संरक्षण और बायोरेमेडिएशन के क्षेत्र में कई सफल तकनीकों का विकास किया है।

मानव संसाधन विकास के तहत संस्थान ने “मृदा एवं जल संरक्षण तथा जलसंभर प्रबंधन” विषय पर 130 नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए हैं। मार्च 2026 तक 3,218 अधिकारियों और 5,598 सहायकों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त 1,642 लघु पाठ्यक्रमों के माध्यम से 46 हजार से अधिक प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया गया है। संस्थान उत्तराखंड में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-जलागम विकास घटक, उत्तराखंड जलवायु अनुकूल वर्षा आधारित कृषि परियोजना, झरना एवं नदी पुनरुद्धार, बाँस मिशन और चारधाम परियोजना समेत कई योजनाओं में तकनीकी और ज्ञान साझेदार के रूप में कार्य कर रहा है।

खेती का नया विकल्प बना लेमन ग्रास:

उत्तराखंड में नदी किनारे के क्षेत्रों में लगातार हो रहे कटाव,बाढ़ और नए सड़क निर्माण कार्यों के कारण पारंपरिक खेती प्रभावित हो रही है। ऐसी परिस्थितियों में किसान अब वैकल्पिक और कम जोखिम वाली खेती की ओर बढ़ रहे हैं। इसी क्रम में कई क्षेत्रों में लगभग 60 हेक्टेयर भूमि पर लेमन ग्रास की खेती की जा रही है,जो किसानों के लिए आय का नया स्रोत बन रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार नदी किनारे की भूमि पर हर वर्ष बाढ़ और मलबा आने से धान, गेहूं और सब्जियों जैसी पारंपरिक फसलें नुकसान झेलती हैं। वहीं सड़क निर्माण परियोजनाओं के चलते भी कृषि भूमि का दायरा लगातार कम हो रहा है। ऐसे में लेमन ग्रास जैसी औषधीय और सुगंधित फसल किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित हो रही है। लेमन ग्रास की खासियत यह है कि इसे कम पानी और अपेक्षाकृत कम उपजाऊ भूमि में भी उगाया जा सकता है। इसकी मांग औषधीय उत्पादों, कॉस्मेटिक उद्योग और सुगंधित तेल निर्माण में तेजी से बढ़ रही है।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय