शोध की गुणवत्ता, नवाचार और तकनीकी दृष्टिकोण पर केंद्रित रही यूओयू की शोध कार्यशाला
हल्द्वानी , 19 अगस्त (हि.स.)। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी के शोध एवं नवाचार निदेशालय द्वारा 18-19 अगस्त को दो दिवसीय शोध कार्यशाला एवं पीएचडी शोधार्थियों की छह माह की प्रगति समीक्षा आयोजित की गई। कार्यशाला का उद्देश्य शोध की गुणवत्ता एवं प्रासंगिकता बढ़ाने, राष्ट्रीय एवं वैश्विक शोध प्रवृत्तियों से शोधार्थियों को परिचित कराने तथा अंतर्विषयक एवं नवाचारी शोध को प्रोत्साहित करना रहा।
कार्यक्रम के दूसरे दिन शुभारंभ सुहानी शर्मा की प्रस्तुति एवं संगीत विभाग के सांस्कृतिक कार्यक्रम से हुआ। शोध एवं नवाचार निदेशक प्रो. गिरजा प्रसाद पांडेय ने शोध की गुणवत्ता, सामाजिक प्रासंगिकता और प्रभाव बढ़ाने पर जोर देते हुए शोधार्थियों के लिए ‘शोध प्रोत्साहन’ पहल की घोषणा की। तकनीकी सत्र में इंजीनियर नवीन पांगती ने ‘रिसर्च डिजाइन एंड सिस्टम्स एप्रोच’ विषय पर व्याख्यान देते हुए जटिल समस्याओं के समग्र समाधान में सिस्टम्स एप्रोच, बाइनरी एवं स्पेक्ट्रम थिंकिंग की भूमिका समझाई। उन्होंने उत्तराखण्ड की स्थानीय कला परंपराओं और आधुनिक शोध पद्धतियों के बीच संबंध को भी रेखांकित किया।
आईसीएआर के डॉ. जे.सी. भट्ट ने ‘बदलते समय में कृषि अनुसंधान : चुनौतियां, नवाचार एवं भविष्य की संभावनाएं’ विषय पर कृषि अनुसंधान, हरित क्रांति में आईसीएआर की भूमिका तथा कृषि विज्ञान केंद्रों के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने पर्वतीय कृषि की चुनौतियों के समाधान के लिए मोबाइल तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसी तकनीकों के उपयोग की आवश्यकता बताई। मुख्य अतिथि जी.बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शिवेंद्र कुमार कश्यप ने शोधार्थियों से पारंपरिक ज्ञान की सीमाओं से आगे बढ़कर स्वतंत्र एवं रचनात्मक चिंतन के साथ शोध करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि तकनीकी विकास के साथ अपनी जड़ों और मूल ज्ञान प्रणालियों से जुड़ाव बनाए रखना आवश्यक है।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहानी ने अध्यक्षीय संबोधन में वैश्विक स्तर पर हो रहे शोध एवं उभरती शोध प्रवृत्तियों से परिचित होने तथा शोध की गुणवत्ता और प्रासंगिकता को अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से मजबूत करने पर जोर दिया। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन उप निदेशक डॉ. पी.के. सहगल ने किया। कार्यशाला के उपरांत पीएचडी शोधार्थियों की छह माह की प्रगति समीक्षा की गई। वनस्पति विज्ञान, प्राणी विज्ञान, कंप्यूटर विज्ञान, हिंदी, अंग्रेजी, गृह विज्ञान, संस्कृत, शिक्षा, पर्यावरण विज्ञान एवं गणित सहित विभिन्न विषयों के शोधार्थियों ने अपने शोध कार्य की प्रगति प्रस्तुत की। संबंधित शोध निदेशकों एवं पर्यवेक्षकों ने शोधार्थियों के कार्य, शोध पद्धति, दिशा एवं आगामी कार्ययोजना की समीक्षा कर आवश्यक अकादमिक सुझाव दिए।
दो दिवसीय आयोजन ने शोधार्थियों को विविध विषयों के विशेषज्ञों से संवाद, नवाचारी शोध दृष्टिकोण तथा अपने शोध कार्य के अकादमिक मूल्यांकन का अवसर प्रदान किया। कार्यशाला ने विश्वविद्यालय में अंतर्विषयक, नवाचारी और वैश्विक दृष्टिकोण से समृद्ध शोध संस्कृति विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
हिन्दुस्थान समाचार / अनुपम गुप्ता