पिरूल से हस्तशिल्प उत्पाद बनाकर 45 महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहीं नैनीताल की भारती
नैनीताल, 10 अगस्त (हि.स.)। नैनीताल जनपद के रामगढ़ विकासखंड के घ्वेती गांव की निवासी एक युवा भारती जीना ने पहाड़ के पर्यावरणीय चिंता का विषय माने जाने वाले चीड़ के पेड़ की वनाग्नि का कारण बनने वाली पिरूल कही जाने वाली पत्तियों से हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करने के पारंपरिक हुनर को रोजगार और महिला सशक्तिकरण से जोड़ते हुए गांव की 40 से 45 महिलाओं को प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भरता की राह से जोड़ा है। इसके साथ ही महिलाएं जंगलों से पिरूल एकत्रित कर वनाग्नि के जोखिम को कम करने में भी योगदान दे रही हैं।
बताया गया है कि भारती जीना ने पिरूल से टोकरी बनाने का हुनर अपने दादा से सीखा था। उन्होंने इसी पारंपरिक कौशल को रोजगार का माध्यम बनाते हुए गांव की महिलाओं को इससे जोड़ा और उन्हें पिरूल से विभिन्न हस्तशिल्प उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया। इसके बाद महिलाएं जंगलों से पिरूल एकत्रित कर उसे सुरक्षित स्थान पर रखती हैं और उससे हस्तशिल्प सामग्री तैयार करती हैं।
इससे उन्हें आजीविका का साधन मिल रहा है, वहीं जंगलों में सूखे पिरूल की मात्रा कम होने से वनाग्नि के जोखिम को घटाने में भी मदद मिल रही है। हाल ही में कर्तव्य फाउंडेशन से जुड़ने के बाद भारती जीना के प्रयासों को और मजबूती मिली है। उनके कार्य की जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने भी सराहना की है। उनकी पहल स्थानीय संसाधनों के उपयोग, महिला सशक्तिकरण, रोजगार सृजन और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने का उदाहरण बनी है।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. नवीन चन्द्र जोशी