सामाजिक कुरीति पर बनी ‘साँकल’ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान

 


जयपुर, 25 सितंबर (हि.स.)। राजस्थान के जैसलमेर जिले की खूती की ढाणी में वर्षों पहले जन्मी एक सामाजिक कुरीति पर आधारित फिल्म ‘साँकल’ अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रही है। देदिप्या जोशी के लेखन एवं निर्देशन में बनी यह फिल्म अब तक 45 अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में चयनित हो चुकी है और 15 से अधिक पुरस्कार हासिल कर चुकी है।

फिल्म की कहानी रक्त की कथित ‘शुद्धता’ के नाम पर विकसित हुई एक सामाजिक प्रथा के इर्द-गिर्द बुनी गई है। गांव के लोग अपने बेटों का विवाह दूसरे गांवों की बेटियों से करते रहे, लेकिन अपनी बेटियों का विवाह गांव से बाहर करना बंद कर दिया। समय के साथ जब गांव की बेटियां विवाह योग्य हुईं तो पंचायत ने उनका विवाह गांव के ही कम उम्र के लड़कों से कराने का फैसला किया। इसी पृष्ठभूमि में केसर और अबीरा की कहानी सामने आती है, जहां उम्र का अंतर रिश्तों और जिम्मेदारियों के बीच संघर्ष पैदा करता है।

फिल्म में चेतन शर्मा और तनीमा भट्टाचार्य ने केसर और अबीरा की भूमिकाएं निभाई हैं। मिलिंद गुणाजी, हरीश कुमार और जगत सिंह ने भी महत्वपूर्ण किरदार निभाए हैं। फिल्म का निर्माण आनंद राठौर और देदिप्या जोशी ने किया है।

‘साँकल’ सामाजिक मौन और कुरीतियों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाती है। फिल्म में बचपन, जिम्मेदारी, महिला के संघर्ष और सामाजिक दबाव जैसे विषयों को बिना सनसनी और अश्लीलता के संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। इसी वजह से फिल्म को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में पहचान मिली है।

मंच के सह-संस्थापक एवं मुख्य विषय-वस्तु अधिकारी प्रवीण सिंघल ने कहा कि ‘साँकल’ जैसी फिल्में सिनेमा की सामाजिक भूमिका को सामने लाती हैं। उन्होंने कहा कि फिल्म ऐसी सच्चाई को सामने लाती है, जिस पर समाज अक्सर बात करने से कतराता है। जमीन से जुड़ी और प्रभावशाली कहानियों को दर्शकों तक पहुंचाना मंच की सोच का हिस्सा है और ‘साँकल’ इसी विचार को आगे बढ़ाती है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश