विश्वविद्यालयों को राष्ट्रचेतना और इतिहास के पुनर्पाठ का केंद्र बनना होगा— ओंकार सिंह लखावत
सम्राट पृथ्वीराज चौहान जयंती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
अजमेर, 15 मई(हि.स.)। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर की पृथ्वीराज चौहान ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक शोध केंद्र के तत्वावधान में सम्राट पृथ्वीराज चौहान की 860वीं जयंती के उपलक्ष्य में “तराइन से परे पृथ्वीराज : पुनर्कल्पित इतिहास विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में इतिहास, राष्ट्रचेतना, भारतीय ज्ञान परंपरा तथा सांस्कृतिक विरासत के विविध आयामों पर विस्तृत चर्चा हुई। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े गणमान्य व्यक्तियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
मुख्य अतिथि मसूदा विधायक एवं विश्वविद्यालय प्रबंध मंडल सदस्य वीरेंद्र सिंह कानावत ने कहा कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान भारतीय इतिहास के ऐसे वीर शासक थे जिन्होंने विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध संघर्ष करते हुए राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा की। उन्होंने कहा कि अजमेर की पहचान चौहान वंश की गौरवशाली परंपरा से जुड़ी हुई है और आज भी तारागढ़, आना सागर तथा ढाई दिन का झोपड़ा जैसे ऐतिहासिक स्थल उस विरासत के साक्षी हैं। उन्होंने तारागढ़ स्थित सम्राट पृथ्वीराज चौहान स्मारक का उल्लेख करते हुए कहा कि यह स्मारक केवल एक प्रतिमा नहीं, बल्कि राष्ट्रगौरव और इतिहास चेतना का प्रतीक है।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता राजस्थान धरोहर प्राधिकरण के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत ने कहा कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान का इतिहास केवल एक युद्ध की पराजय तक सीमित कर देना ऐतिहासिक अन्याय है। उन्होंने कहा कि पृथ्वीराज चौहान भारतीय वीरता, राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक गौरव और आत्मसम्मान के प्रतीक थे तथा उनके व्यक्तित्व के अनेक आयामों पर गंभीर शोध की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की एक प्रोफेसर सम्राट पृथ्वीराज चौहान पर बारह वर्षों तक शोध कर सकती है, तो भारतीय विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों और इतिहासकारों को भी अपने महापुरुषों पर व्यापक अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय इतिहास लेखन में अनेक बार हमारे राष्ट्रनायकों के योगदान को सीमित अथवा विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसके कारण नई पीढ़ी अपने गौरवशाली अतीत से दूर होती चली गई। लखावत ने विश्वविद्यालयों और पुस्तकालयों में राष्ट्रवादी साहित्य और भारतीय इतिहास से जुड़े प्रामाणिक ग्रंथों की उपलब्धता पर बल देते हुए कहा कि यदि विद्यार्थियों को अपने राष्ट्रनायकों का सही इतिहास पढ़ाया जाएगा तो उनमें देशभक्ति, स्वाभिमान और राष्ट्रनिर्माण की भावना स्वतः विकसित होगी।
उन्होंने कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रचेतना पर आधारित शोध एवं विमर्श का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। उन्होंने अपने संबोधन में सम्राट पृथ्वीराज चौहान स्मारक निर्माण, खानवा युद्ध स्मारक तथा राजस्थान की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण से जुड़े अनेक अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि इतिहास केवल पुस्तकों में सीमित विषय नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के चरित्र निर्माण का आधार है। लखावत ने शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे सम्राट पृथ्वीराज चौहान, राजस्थान के गौरवशाली इतिहास तथा भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं पर लेखन और शोध कार्य को आगे बढ़ाएँ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि इतिहास केवल शिलालेखों, अभिलेखों और पुरातात्विक स्रोतों का विवरण नहीं होता, बल्कि लोककथाएँ, जनस्मृतियाँ और सांस्कृतिक परंपराएँ भी इतिहास की जीवंत धारा होती हैं। उन्होंने कहा कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान जैसे राष्ट्रनायकों को केवल एक युद्ध की पराजय के आधार पर नहीं आँका जा सकता।
इससे पूर्व कार्यक्रम के प्रारंभ में स्वागत उद्बोधन देते हुए शोध केन्द्र के मानद निदेशक प्रो. अरविंद पारीक ने कहा कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान केवल एक ऐतिहासिक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय शौर्य, स्वाभिमान और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / संतोष