महालक्ष्मी मंदिर में निभाई रियासतकालीन परंपरा

 


जयपुर, 24 जुलाई (हि.स.)। आषाढ़ी दशहरे के पावन अवसर पर शुक्रवार को गुलाबी नगरी जयपुर में सदियों पुरानी रियासतकालीन परंपरा का बड़े ही श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ निर्वहन किया गया। चांदी की टकसाल स्थित प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर में पूर्व राजपरिवार के सदस्यों ने माता महालक्ष्मी के समक्ष सोने के हल से मोतियों की सांकेतिक बुआई कर प्रदेश में खरीफ की फसल के शुभारंभ का शुभ शगुन किया। इस विशेष धार्मिक अनुष्ठान से पूर्व माता महालक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना कर प्रदेश में समय पर अच्छी वर्षा, सुख-समृद्धि और भरपूर पैदावार की कामना की गई।

मान्यता है कि जयपुर रियासत काल से चली आ रही इस परंपरा के बाद ही प्रदेशभर के किसान अपने-अपने खेतों में हल और भूमि का पूजन कर आधिकारिक रूप से खरीफ फसल की बुआई शुरू करते हैं। मंदिर परिसर में आयोजित इस भव्य आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भी भाग लिया और माता के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

मंदिर के महंत राजेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि आषाढ़ी दशहरा कृषि परंपराओं और लोक आस्था से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। उन्होंने कहा कि रियासत काल से चली आ रही यह पावन परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा, विधि-विधान और पवित्रता के साथ निभाई जाती है।आषाढ़ी दशहरे के उपलक्ष्य में मंदिर परिसर में दिनभर विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। सुबह पं. विक्रम कुमार शर्मा के आचार्यत्व में विशेष 'वर्षा यज्ञ' का आयोजन किया गया, जिसमें प्रदेश में समय पर अच्छी बारिश और जनकल्याण की आहुतियां दी गईं। शाम के समय पं. विकास शर्मा एवं गर्वेश शर्मा के सानिध्य में माता महालक्ष्मी की भव्य महाआरती उतारी गई। महाआरती के पश्चात उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को महाप्रसाद का वितरण किया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश