मकर संक्रांति पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा
जयपुर, 13 जनवरी (हि.स.)। नव अंग्रेजी वर्ष 2026 का पहला बड़ा पर्व मकर संक्रांति 14 जनवरी को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा।
सुबह से शाम तक आसमान में रंग-बिरंगी पतंगें इठलाएंगी। डीजे की धुन पर दिनभर वो काटा के शोर के साथ पतंगबाजी होगी।
सुबह का चाय-नाश्ता और दोपहर का भोजन छतों पर ही होगा। देर शाम आतिशबाजी कर विशिंग लैंप आसमान में छोड़े जाएंगे। मंगलवार को लोगों ने जमकर पतंगे और चरखी खरीदी। हांडीपुरा सहित पतंगों के बाजारों में दिनभर पतंग प्रेमियों का हुजूम उमड़ता रहा। वहीं घरों में महिलाओं ने तिल और गुड़ के लड्डू बनाए। बाजारों में फीणी की जमकर बिक्री हुई। मंगलवार को गलता गेट स्थित गीता गायत्री मंदिर में रंग-बिरंगी पतंगों की झांकी सजाई गई। पं. राजकुमार चतुर्वेदी ने बताया कि मकर संक्रांति पर पतंगों का निशुल्क वितरण भी किया जाएगा।
ज्योतिषाचार्य बनवारी लाल शर्मा ने बताया कि माघ कृष्ण एकादशी 14 जनवरी को अपराह्न 03: 05 मिनट पर सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इसी के साथ सूर्यदेव उत्तरायण हो जाएंंगे और मलमास भी समाप्त हो जाएगा। विवाह, उपनयन, गृह प्रवेश सहित अन्य मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाएंगे। इसका पुण्यकाल सुबह 8:43 से शाम 5: 50 तक रहेगा। इस बार सर्वार्थ सिद्धि योग का भी दुर्लभ संयोग बन रहा है। इस दिन सामान्य पुण्यकाल अपराह्न 3:13 बजे से शाम 5:45 बजे तक रहेगा, जिसकी अवधि 2 घंटे 32 मिनट होगी। वहीं महा पुण्यकाल अपराह्न 3:13 बजे से शाम 4:58 बजे तक रहेगा, जो कुल 1 घंटा 45 मिनट का होगा। धर्मशास्त्रों में इस समय स्नान, दान और जप-तप का विशेष महत्व बताया गया है।
इस वर्ष संक्रांति का वाहन व्याघ्र है। संक्रांति देवी ने पीतांबरी वस्त्र धारण किए हुए हैं, हाथ में रजत पात्र है और वे पश्चिम दिशा की ओर गमन कर रही हैं। उन्होंने बताया कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। इस दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनि देव के घर प्रवेश करते हैं। शनि मकर और कुंभ राशि के स्वामी हैं, इसलिए यह पर्व पिता-पुत्र के अनोखे मिलन का प्रतीक माना जाता है।
तिल: शनिदेव का प्रतीक माना जाता है। तिल दान करने से शनिदोष दूर होता है।
कंबल: इसके दान से राहु के अशुभ प्रभाव से बचाव होता है।
गुड़: गुरु की प्रिय वस्तु है। इसके दान से शनि, गुरु और सूर्य के दोष दूर होते हैं।
खिचड़ी: इसका दान अत्यंत शुभ माना गया है। इसमें प्रयुक्त उड़द दाल का संबंध शनिदेव से माना जाता है।
चावल: इसे अक्षय अनाज कहा गया है, इसके दान से अन्न-धन की वृद्धि होती है।
नमक-वस्त्र: इनके दान से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है।
देशी घी: इसके दान से करियर में लाभ और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
पशु चारा: गाय को चारा खिलाने से घर-आंगन में खुशहाली बनी रहती है।
दान के सबसे बड़े पर्व मकर संक्रांति पर इस बार विशेष संयोग बन रहा है। विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि दान देने वाले पर एकादशी के नियम बाधक नहीं होते, केवल स्वयं सेवन से परहेज करना चाहिए।
मकर संक्रांति पर चावल-दाल की खिचड़ी का सेवन और दान विशेष महत्व रखता है। कई क्षेत्रों में इसे ‘खिचड़ी पर्व’ के रूप में मनाया जाता है।
ज्योतिषाचार्य पं. पुरुषोत्तम गौड़ ने बताया कि इस वर्ष मकर संक्रांति पर षट्तिला एकादशी होने से पर्व और भी पुण्यकारी हो गया है। इस दिन तिल और चावल दोनों का भगवान को अर्पण और दान किया जाएगा।
मकर संक्रांति पर चावल और दाल का दान पूर्णत: शास्त्रसम्मत है। शास्त्रों में दान को लेकर एकादशी का कोई निषेध नहीं है।
ज्योतिषाचार्य राज कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि संक्रांति के दिन सुबह जल्दी उठकर नहाने के पानी में थोड़ी हल्दी डालनी चाहिए। भगवान विष्णु के मंदिर जाकर तिल और गुड़ का भोग लगाएं और तिल की रेवडिय़ों को प्रसाद के रूप में वितरित करें। इस दिन श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करना बेहद शुभ होगा। ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: का 108 बार जाप करना चाहिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश