दवा के प्रतिकूल प्रभावों की रिपोर्टिंग मरीजों की सुरक्षा के लिए जरूरी : गायत्री राठौड़
जयपुर, 22 सितंबर (हि.स.)। प्रमुख शासन सचिव चिकित्सा शिक्षा गायत्री राठौड़ ने कहा कि मरीज तक दवा पहुंचाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि दवा सुरक्षित हो और उसका तर्कसंगत उपयोग किया जाए। दवा के प्रतिकूल प्रभाव सामने आने पर उनकी पहचान कर समय पर रिपोर्टिंग करने से मरीजों की सुरक्षा बढ़ाने और भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने में मदद मिलती है।
राठौड़ मंगलवार को एसएमएस मेडिकल कॉलेज के ग्राउंड ऑडिटोरियम में चिकित्सा शिक्षा विभाग, राजस्थान सरकार एवं एसएमएस मेडिकल कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में 6वें राष्ट्रीय फार्माकोविजिलेंस सप्ताह-2026 के अवसर पर आयोजित राज्य स्तरीय फार्माकोविजिलेंस संवेदनशीलता कार्यशाला को संबोधित कर रही थीं।
उन्होंने कहा कि चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ को दवाओं के प्रतिकूल प्रभावों की रिपोर्टिंग में किसी तरह का डर या संकोच नहीं होना चाहिए। ऐसी रिपोर्टिंग किसी चिकित्सक, रेजिडेंट या नर्स के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का आधार नहीं होगी। दवा से हुई अप्रत्याशित प्रतिक्रिया की जानकारी देना गलती स्वीकार करना नहीं, बल्कि मरीज की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी निभाना है।
उन्होंने मेडिकल कॉलेजों में दवाओं के साथ मेडिकल डिवाइस की सुरक्षा पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि आईवी सेट, कैथेटर, वेंटिलेटर, डायलिसिस सर्किट या अन्य चिकित्सा उपकरण में खराबी सामने आने पर उसकी भी रिपोर्टिंग की जानी चाहिए।
राठौड़ ने कहा कि किसी एक अस्पताल में की गई प्रतिकूल दवा प्रतिक्रिया (एडीआर) की रिपोर्ट भी पूरे प्रदेश के मरीजों की सुरक्षा में उपयोगी हो सकती है। किसी विशेष बैच की दवा से असामान्य प्रतिक्रिया के कई मामले सामने आने पर इसकी जानकारी राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड (आरएमएससीएल) तक पहुंचने से संबंधित बैच की जांच और आवश्यक कार्रवाई की जा सकती है। उन्होंने एसडीआरपी-2026, बेड-हेड टिकट की नियमित समीक्षा, एक साथ कई दवाएं लेने वाले मरीजों की निगरानी और दवा से होने वाली एलर्जी को मरीज के रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज करने पर जोर दिया।
आयुक्त चिकित्सा शिक्षा बाबूलाल गोयल ने कहा कि सभी मेडिकल कॉलेजों में फार्माकोविजिलेंस को नियमित चिकित्सा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों से दवाओं के प्रतिकूल प्रभावों की रिपोर्टिंग को नियमित कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।
दवाइयों के दुष्प्रभाव निगरानी सेल की राज्य समन्वयक डॉ. मोनिका जैन ने एडीआर सेंटर की रिपोर्टिंग में राजस्थान को देश में अग्रणी बनाने की दिशा में काम करने पर जोर दिया।
कार्यशाला के तकनीकी सत्र में चेतन जाधव ने दवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए हैंडलिंग, स्टोरेज, डिस्ट्रीब्यूशन, प्रोडक्ट रिटर्न और शिकायतों के निस्तारण से जुड़े पहलुओं की जानकारी दी। डॉ. सुरिंदर खेर ने क्लिनिकल ट्रायल के दौरान मरीजों की सुरक्षा और डॉ. गायत्री देवी रविचंद्रन ने दैनिक चिकित्सा अभ्यास में फार्माकोविजिलेंस की भूमिका पर प्रकाश डाला।
बेस्ट प्रैक्टिस सत्र में निजी मेडिकल कॉलेजों की ओर से डॉ. शिप्रा जैन, डॉ. प्रियंका राठी और डॉ. नमिता चौधरी ने फार्माकोविजिलेंस को मजबूत करने से जुड़े अनुभव साझा किए। डॉ. मोनिका जैन के मॉडरेशन में ‘क्या फार्माकोविजिलेंस हमारे दवा लिखने के तरीके को बदल सकता है?’ विषय पर पैनल चर्चा भी हुई।
कार्यशाला में फार्माकोविजिलेंस से जुड़े चिकित्सक, चिकित्सा शिक्षक और विशेषज्ञ शामिल हुए। कार्यक्रम के अंत में अतिरिक्त निदेशक (अकादमिक), चिकित्सा शिक्षा डॉ. रश्मि गुप्ता ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
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हिन्दुस्थान समाचार / पारीक